रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

अभिनेता की डायरी : भाग दो

आज के अभ्यास की शुरुआत थोड़ी अलग प्रकार से हुई। मेरा एक विद्यार्थी है – राकेश। बहुत मेहनती लेकिन पूरा काफ्काई और दोस्त्रोवासकी के चरित्रों के द्वन्द से भरा हुआ – अंतर्मुखी, शर्मिला और कई सारी मनोग्रंथियों के बोझ से लदा हुआ। ज़रूरत से ज़्यादा संवेदनशील और गुस्सैल। ख़ूब मेहनती और बला का ईमानदार। ऐसे विद्यार्थियों का अलग से ध्यान रखना पड़ता है। बहरहाल, इसकी बात फिर कभी करूँगा, मूल बात यह है कि इसके मन में यह भ्रम था कि वो अपनी बात अच्छे से किसी को भी समझा नहीं सकता है। एक दिन पहले इसने मुझे एक लंबा सा मैसेज किया इस विषय पर। उसको पढ़कर लगा कि उसके इस भ्रम के पीछे कई सारी वजहें और घटनाएं हैं, जो बहुत बचपन से ही इसके साथ घटित होती रही है। तो आज सबसे पहले इसे इस भ्रम से निकालने का प्रयत्न किया क्योंकि कोई भी इंसान तबतक एक अच्छा कलाकार नहीं हो सकता जबतक वो दुनियां के तमाम भ्रमों को चीरकर सच से साक्षत्कार ना कर ले। सबके सामने जब राकेश लंबी बातचीत के क्रम जब चल रहा था तो उसकी आंखें भर रहीं थीं। अबतक उसके कई सारे भ्रम दूर करने में कुशलता पाई है आगे भी इस आशा के साथ आज अभिनेताओं के अनुभव की डायरी कुछ इस प्रकार हैं; शुरुआत राकेश से करते हैं. सबकुछ बिना काट-छांट के प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि इनके अनुभव आपतक जस के तस पहुंचे - 
राकेश - आज सुबह उठने के साथ रंगशाला जाने में मुझे थोड़ा असहजता महसूस हो रहा था एक तो देर से उठा। और दूसरा जिससे मैं अपने भईया से नजरें मिलाने में गिलानी महसूस कर रहा था। जो मैं नही चाहता था वही बात मेरे दोस्तों को पता चल गया। खैर जो हुआ एक तरह से अच्छा ही हुआ। मैं इस पर ज्यादा चर्चा नही करना चाहता हूं।
आज का दिन मेरे लिए एक दम नया था जो मैंने कभी सोचा भी न था। आज मुझे नई जानकारी मिली की ज्यादा सम्वेदनशील होना बहुत घातक होता है.
आज बहुत दिनों के बाद एक्सरसाइज करके जो इस वक्त मेरे शरीर में एक मीठी सी दर्द महसूस कर रहा हूं उससे मजा आ रहा है जिस दिन एक्सरसाइज होता है उस दिन नींद भी अच्छी आती है अभी भी आ रही है लेकिन थोड़ा टास्क पूरा कर लेता हूं. एक्सरसाइज के बाद भईया ने ब्रेख़्त के कुछ कविताओं के बारे में जानकारी दी तथा उन्होंने ये भी समझाया की कविता से दूर मत भागो उनको पढो और समझो मैं भी कविता पढ़ने से दूर भागता हूं पर सुनना और समझना अच्छा लगता है। दुसियन्त जी की कविता की कुछ किताबें है मेरे पास अब पढ़ना शुरू करूगां फिलहाल मुझे नींद आ रही है मैं चला सोने।
निवास - आज हमने शारीरिक व्यायाम किया। दौड़ने से लेकर और जितने भी व्यायाम थे। वो सब हमने किया और हमें मजा भी बहुत आ रहा था। जब हम सब ने एक साथ एक दुसरे के हाथ पकड़कर एक गोला बना कर एक पत्ते को फूंक मार कर उसे हिलाने की कोशिश कर रहे थे हमें बहुत हंसी भी आ रहा थी। ऐसे तो मैं हमेशा से ही अपने आप को खुश रखने की कोशिश करता रहता हूं और जहां तक कि मैं खुश भी रहता हूं और दूसरों को भी इस तरह से खुश रखने की कोशिश करता रहता हूं। फूंक मारने के बाद हम लोग ने दस मिनट रिलाईज भी किया फिर हमारे गुरु जी ने सबको एक साथ बैठाकर ब्रेख्त की कुछ कविताएं भी पढ़ाया। फिर राकेश भैय्या आपने जो सच्ची कहानी सुनाई वो बहुत ही अच्छा था। और हमने इस कहानी से यह भी सिखा कि हमें अपने कर्तव्य करतें रहना चाहिए फल कि चिंता न करें।

अभिनव कश्यप – स्वस्थ्य और उर्जावान रहने के लिए किसी भी अभिनेता के लिए शारीरिक अभ्यास निहायत ही ज़रुरी है. बीच में जो ब्रेक दिया जाता है उसे सर रियलाइजेशन ब्रेक कहते हैं अर्थात अब तक के अभ्यास में जो कुछ भी किया वो क्या था उसके बारे में चिंतन करना. मतलब कि शरीर को आराम देकर मस्तिष्क को चिंतनशील बनाना. तत्पशचात हम शब्द के अभ्यास में लगे कि क और क़ का सही उच्चारण कैसे होता है. कुछ देर यह अभ्यास करने के बाद हम साहित्य की ओर मुड़े, आज ब्रेख्त की कुछ कविताएँ पढकर सर ने हमें ब्रेख्त पढ़ने को मोटिवेट किया.
शारीरिक अभ्यास की मुझे आदत नहीं है इसीलिए थकान थोड़ी ज़्यादा लग रही है, लेकिन जानता हूँ अगर यह लगातार करता रहा तो आदत में शामिल हो जाएगी. आभार, इतने कठिन श्रम में सम्मिलित करने के लिए.

संत रंजन : आज व्यायाम करने के पश्चात मैंने क्लास में जो कुछ भी सीखा, समझा उसे निम्न बिंदुओं के रूप में आपके समक्ष पेश कर रहा हूँ -
1. अभिनेता की संवेदनशीलता - कोई भी अभिनेता के लिए उसकी संवेदना ही उसकी वह जादुई छड़ी होती है जिससे वो अपना अभिनय का जादू दिखा पाता है। असंवेदनशील अभिनेता उस फटे हुए दूध की तरह होता है जिससे सिर्फ छेना बनाया जा सकता है या वो भी नहीं। वहीं संवेदनशील अभिनेता उस शुद्ध दूध की तरह होता है जिससे हम कई तरह की मिठाइयां, छाछ, घी आदि भी बना सकते हैं। अब ध्यान देने योग्य बात यह है कि ज़्यादा संवेदनशील होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि अब अति तो हरेक चीज के लिए ख़तरनाक ही होता है।
2. शब्दों का सही-सही उच्चारण - शब्दों का सही उच्चारण करना भी हमारी अभिनय क्षमता को दर्शाता है। अगर कोई अभिनेता शब्दों का सही-सही उच्चारण नहीं कर पाता है तो उसे नाटक या फ़िल्म में हीरो के मरे हुए बाप या उसकी तस्वीर से ज़्यादा का चरित्र उसे मिल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। इसलिए उच्चारण पर मज़बूत पकड़ होना अति आवश्यक है।
3. कविताओं का पठन - सर जी ने बताया कि दुनिया की अच्छी - अच्छी नाटक कवितात्मक रूप में होते हैं। इसलिए अभिनेता को कविता से पीछा न छुड़ाकर उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि एक कविता छोटी ही है जो अकेले एक उपन्यास के बराबर हो सकती है।

एदीप राज : मुझे आज सुबह उठने का मन नही था। फिर भी उठा और अपने सारे क्रिया-कलाप करने के बाद, मैं निकला रंगशाला और सर राकेश के बारे में बता रहे थे जो बहुत ही सेंसिटिव हैं और वो अपने आप को बहुत बाँध कर रखे  हैं। जब उस के बारे सारा बात सुना तो मुझे बहुत ही अच्छा लगा क्योकि कहीं ना कहीं मैं भी वैसा ही हूँ। जो कि सही नही हैं। उसकी बात सुन कर बहुत ही अच्छा लगा। उसमें सबसे बड़ी बात मुझे यह लगी कि उसने अपनी सारी बात सर को बताया। उसके बाद शारीरिक अभ्यास का सिलसिला शुरू हुआ।
आज की सबसे बड़ी बात कि मैं ने "क" और "क़" का उच्चारण करना सीखा। उससे बड़ी बात कि आज मुझे मेरा दो दोस्त और एक भैया ने मुझे उच्चारण करवाने की बहुत कोशिश किये फिर भी मैं ठीक से नही बोल पाया। फिर समय सम्पत हो गया। बहुत ही खराब लगा।
फिर उस के बाद सर ने वो बात बताया जिससे कि मैं बहुत भागता हूँ वो कविता वाली बात थी। जो मुझे कभी भी समझ नही आती है इस लिये मैं भागता हूँ। अब नही भगुँगा क्योंकि हर समस्या का हल नही होता है भागना। मैं जब नाटक देखता हूँ तो बहुत जल्द उब जाता हूँ। आज के लिये इतना ही।

अरुण : आज के क्लास की शुरुआत भी शारीरिक अभ्यास के साथ हुआ। आज हमने कुछ नए शारीरिक अभ्यास किये। इस अभ्यास के दौरान हमलोगों को एक नई चीज़ "अभिनेताओं के द्वारा सांसो का प्रयोग"जानने का मौका मिला। इस दौरान हमने जाना कि एक अभिनेता को अपने सांसो पे मजबूत पकड़ होनी चाहिए। क्योकि आपके सांसो और संवादों का बेहतरीन समिश्रण ही आपके सम्वाद अदायगी को ज़्यादा प्रभावशाली बनाता है तथा आपके अभिनय के एक पक्ष को और ज़्यादा मजबूत करता है। साथ ही साथ सांसों का सही संचालन अभिनय में आपके शारीरिक मनोदशा को भी प्रभावित करता है।
तीसरे सत्र में हमलोगों ने बर्तोल्त ब्रेख़्त की कुछ कविताओ का अध्ययन किया। जोकि मुख्य रूप से पॉलिटिकल व्यंग्य था। कविताएं साहित्य की वो मज़बूत विधा है जो कम शब्दों में एक बड़ी दास्तान कहने का माददा रखती है। एक अच्छी कविता चाहे वो किसी भी विषय पर आधारित क्यों न हो,उसे पढ़ते वक़्त आप एक साथ कई रसों की अनुभूति पाते हैं।
आज हमलोगों ने दो नाटक भी देखे। जिसमें से एक जैपनीज़ नाटक"तोतो चान" का हिंदी नाट्य रूपांतरण किलकारी बाल भवन, पटना के द्वारा प्रस्तुत था। छोटे छोटे बच्चों का अभिनय देख मन प्रसन्न हो गया। नाटक में अच्छी शिक्षा पद्धति की चर्चा की गई है। सचमुच एक अच्छी शिक्षा पद्धति वही सही है जो बच्चों को बोझ न लगे। शिक्षको को चाहिए कि वो छोटे छोटे बच्चों में चीज़ों के प्रति रुचि पैदा करें। अगर वो ऐसा करतें हैं तो बच्चे ख़ुद उसे समझने के लिए उतावले हो उठेंगे। उन्हें बच्चों को प्रकृति और कलाओं से जोड़ना चाहिए ताकि बचपन से ही उनकी बौद्धिक क्षमता मजबूत हो। क्योकि कला ही एक ऐसा माध्यम है जो की अच्छी और बुरी चीज़ों में फर्क करना और समाज की समझ को आसान बनाती है। अगर ऐसी शिक्षा पद्धति हो तो वो कही से भी बोझ नही लगेगी।
हमलोगों ने दूसरा नाटक" शम्बूक वध" देखा। नाटक पूरी तरह से वर्ण व्यवस्था पर जबरदस्त कुठाराघात करती है। कहीं न कहीं आज भी ये नाटक उतना ही प्रासंगिक है जितना कल था। ये वर्ण व्यवस्था समाज को अराजक बनाती है। लाभ- हानि तो दूर, इससे सिर्फ और सिर्फ इंसानियत की मिट्टी पलीद होती है।

दिव्यांश ओझा - आज मैंने थोड़ा लेट उठा। उठने के साथ ही मेरा मन और शरीर दोनो बैचैन हो गया इतनी बेचैन हो गया कि मैं ब्रश करना भूल गया। रोज की भांति आज कुछ अलग लगा क्योकि आज सर ने पहले की बैठ के बाता रहे थे तो मुझे लगा कि सर कहीं सात बजे तो नही बुलाये थे। कुछ देर बाद अभ्यास शुरू हुआ और रोज की तरह जैसे होता है।10 मिनट का ब्रेक के बाद नुक़्ता पर काम हुआ। क और क़ पर काम हुआ। ये आभास हुआ कि बचपन में जो भी पढ़ा वो सब लोग पढ़ते है पर हमने जो पढ़ा वो एक एक्टर ही बिसेस रूप से पढ़ते है। मैं कविता, दोहे ,ग़ज़ल ये चीज जो समझना मै नही चाहता था पर ये समझना बहुत जरूरी होती है।ताकि आप कम लाइन में ज्यादा समझ सके और अंदर गहराई तक जाना का कोशिश करे। कविता के दो लाइन में बुरी दुनिया समा सकती है बस आपकी समझने और जानने की इक्षा हो। आज तोतो का चांद नाटक खूब मजा आया। मैन देखा कि बच्चे सही में सररती ओर निडर रहते जैसे उन बच्चों ने किया वाकई एक तारीफ है। ना स्टेज से डर ना ओर चीज़ का डर निडर होक किया। नासमझ होते हुए व इतना अच्छा किया हमे तो कुछ समझ है हमे तो उसे ओर अच्छा करना चाहिए।

आकाश कुमार - आज सुबह की शुरुआत सायकिल चलाते हुए रंगशाला पहुँच कर किया और विशेष बात येह की मेरी एक्सर्साइज़ घर से ही शुरू हो जाती है cycling करते हुए 7km की दूरी तय करना। रंगशाला पहुँच कर भैया (पुंज प्रकाश) के साथ सुबह का ज्ञान पाना जैसे सुबह एक्क फूल के ऊपर ओव्स की बूँद पड़ना। ज्ञान मिला की आप किसी भी इंसान के सामने ज्यदा निर्दोषता / भोला ना बनकर जीवन वय्कीत ना करे। क्योँकि लोग आपके भोले पन का गलत इस्तेमाल करने लगेंगे। फिर हम सब अपने दैनिक दिनचर्या मे फिज़िकल एक्सर्साइज़ किया और आज का एक्सर्साइज़ थोड़ा हट कर हुआ क्योँकि आज हमने सह रँगर्क्र्मियो के साथ जमीन पर लेटा और पैर को उठाते हुए माथे के पीछे ले जाना था। इस एक्सर्साइज़ को करते समय मेरे गर्दन पे बहुत दबाव पर रहा था पर मेरे दोस्त कुछ बने के लिये मेहनत तोह करनी ही प्रति है सबकुछ आसानी से नही मिलता है।
दूसरा एक्सर्साइज़ था सह-रँगर्मियो के साथ गोला बना कर बैठे और भैया के आदेश पे हमने केंद्र मे रखे सूखे पत्ते को जोर-जोर से फूँक मारे पर अफसोस की बात येह पत्ता अपने स्थान से टस से मस नही हुआ। खैर इस एक्सर्साइज़ के करने के पीछे एक्क बहुत बड़ा तर्क येह है कि हमे ब्रेथिँग यानी श्वास को पेट से लेना है और ब्रेथिँग के फ्लो पे ध्यान रखना है। अब आते है वोकल एक्सर्साइज़ जिसमे भैया ने सिखाया स्वर और व्यंजन मे भेद और नूख्ता क्या होता है कैसे उचारण करते है। हुमने आज सीखा क और।क कैसे बोले जाते है। साथ मे भैया ने हमसब को अखबार पढ़ने को भी कहा जिससे आप के आवाज और आच्छा हो जाये और आप देश दुनियाँ के गति वीध्यो से जुड़े रहेँगे। भईया हमसब को हिन्दी कविता पढ़ने को कहा क्योँकि कविता से आप यह सीखते है की कैसे एक्क पूरे किताब की बात थोड़े से वाक्य मे कह डालती है। कविता आप के बुध्दि को बढाता है और साथ मे सोचने की शक्ति को भी बढाता है। कक्षा के अँतिम पेहेल मे भैया मेरे सह रंगकर्मी को उसके कल की घटना को सब के सामने वख्या करने को कहा जिससे उसके अन्दर का भ्रम टूटा की वह अछे से बोल नही पाता है हलाँकि मै भी ऐसा ही हूँ और शायद कभी मै भी अच्छे से बोल सकूँ सब के समक्ष। भैया ने हमे किलकारी मे नाटक देखने को कहा वह नाटक बहुत बहुत अच्छा था जिससे बहुत कुछ सीखने को मीला जैसे पाठशाला की पढ़ाई कैसी होनी चहिये और उन baccho ने येह भी शीखाय की नाटक कैसे होता है और कैसे स्पष्ट रूप से अपनी बात अँतिम मे बैठे हुए ऑडियेन्स तक पहुंचानी चहिये। सच मे आज उन बच्चों ने मुझे थोड़ा अभिनय सीखा दिया मैने थेंक्स बोलते हुए निकल गया किलकारी से घर की तरफ दिल मे जुनून लिये एक बेहतर अभिनेता बनने के उद्देश्य से। गलत टायपिंग के लिये माफ करे आपसब।
सन्देश कुमार : आज मैं आठ बजे रंगशाला पहुंचा। उसके बाद रोज की भांति आज भी अपने रंगकर्मी दोस्तो के साथ रनिंग किया। फिर एक्सरसाइज आज बहुत सारे नई एक्सरसाइज सीखने को मिला। एक अभिनेता को अपने सांस पर नियंत्रण कैसे होना चाहिए ओ गुरुजी ने बताय। आज क क़ इसको कैसे बोला जाता है हमने ये सीखा क्योंकि एक अभिनेता को हर शब्द को शुद्ध बोलना पड़ता है। आज कविता के बारे में भी काफी कुछ सीखने को मिला कविता जो कम शब्द में भी बहुत कुछ बताता है। थिएटर से निकलने के बाद हम किलकारी तोतो-चान नाटक देखने गए. किलकारी के बच्चे ने कमाल का अभिनय किया उनसे बहुत बहुत कुछ सीखने को मिला

सोनू : आज जब मैं क्लास पहुंचा तो व्यायाम किया , लेकिन एक व्यायाम जो किया वह समझ मे नही आया, एक सुखा पता मुझसे तीन कदम कि दूरी पर रखा था, और उस पत्ते को फूंक कर उसको उस स्थान से हटाना था ये सिर्फ मुझे बोला गया था । जो मैं बहुत कोशिश कि लेकिन वह पता वहां से टस से मस नही हुआ, उसके बाद ‘क’ और ‘क़’ का उचारण लगातार पांच मिनट तक किया, और फिर अपने दोस्तों को भी बताया । फिर 10 मिनट का ब्रेक हुआ, ब्रेक के बाद अपने गुरु जी के द्वारा तीन चार कविताएं सुनी जिसमे कुछ कविता समझ मे आ गई । फिर एक मित्र ने अपने पेशे से जुड़ी एक स्टोरी सुनाएं जो उनके साथ घटी थी । उनके स्टोरी से मुझे शिक्षा यही मिली कि बुरे से बुरे वक़्त मे भी आशा और विश्वास क़ायम रखनी चाहिए ,जो कि उन्होंने रखा । आज का दिन मेरे लिए बहुत अच्छा गुज़रा.

राहुल सिन्हा : आज का विषय रहा स्टैमिना। एक अभिनेता के लिए उसकी स्टैमिना बड़ी काम की चीज़ होती है। ख़ास तौर पर जब हम मंच पर अभिनय कर रहे होते हैं तब क्योंकि बिना स्टैमिना को होल्ड किये लगभग एक/डेढ़ घंटा अभिनय करना मुश्किल हो जाता है। अपनी ऊर्जा का सही तरीके से इस्तेमाल न करने के कारण एक घंटे के नाटक में ही हम हाँफने लग जाते हैं या हमारा शरीर धीरे-धीरे शिथिल हो जाता है। इसलिए हर कलाकार को अपनी ऊर्जा का सही इस्तेमाल करना आना चाहिए। तो आज हमलोगों ने इसी से सम्बधित कुछ अभ्यास किया।
सबसे पहले हमलोगों ने दौड़ लगाया फिर मेढ़क बनकर एक तय की गई दूरी में फुदकते रहे। इसके बाद एक और मज़ेदार अभ्यास किया। निर्देशानुसार सभी लोगों द्वारा एक बड़ा घेरा बनाया गया और उसके केंद्र में एक सूखा पत्ता रख गया अब शर्त था कि वहाँ से बिना आगे बढ़े उस पत्ते को फूंक कर हिलाना/ उड़ाना है। पत्ता को हिलाने-डुलाने में तो नाकामयाब रहे पर पर थोड़ी देर बाद समझने पर ये स्पष्ट हो गया कि ये भी air stamina का खेल है।
इसके बाद दो शब्दों पर ज़बरदस्त अभ्यास हुआ और ये शब्द थे #क और #क़(नुक़्ता)। अमूमन नवोदित कलाकार को थियेटर या किसी इंस्टीट्यूट में जाकर ही नुक़्ता वाले शब्द से पाला पड़ता है।
अब बारी थी पठन-पाठन क्रिया की तो आज हमलोगों ने कुछ कविताओं का पाठ किया। कुछ कविता ब्रेख़्त की थी तो कुछ रामदयाल सक्सेना की। वाकई कविता को समझना बड़ा मुश्किल काम है। आज वाली कविता तो लगभग समझ के बाहर थी पर एक बात समझ गया कि कविता कैसे कम शब्दों में एक उपन्यास के समतुल्य हो जाती है और इसके भावार्थ में कितने सतह/ तर्क होते है।
इसलिए हर कलाकार अपनी बौद्धिक वृद्धि के लिए रोज़ कम से कम एक कविता तो पढ़नी ही चाहिए।

चन्दन : मैं रोज़ सुबह की शुरुआत किताब पढ़ के करता हूँ।आप के जानकारी के लिए में बतादूँ की मैं अभी 'भगत सिंह और उनके साथियों का दस्तावेज' पढ़ रहा हूँ।इस किताब में गरम के नेता आज़ादी के लिए कैसे काम करते थे और उनका क्या सोच था आजादी के लिए उसके बारे में ज़िक्र किया गया हैं। इसमें ऐसे-ऐसे क्रांतिकारी के बारे में ज़िक्र किया गया हैं जिनका नाम मैं पहली बार सुना हैं।जैसे-शहीद कर्तार सिंह सराभा(इन्हें भगत सिंह अपना गुरु मानते थे और इनका चित्र अपने पास रखते थे),गुरु राम सिंह - आगे कल।
जब मैं लगभग 8:10 रंगशाला पहुँच तो हमारे साथी 'राकेश' की लेखनी पर चर्चा चल रही थी।उसकी समस्या ये है की वह शर्मिला हैं और इसके कारण वह अपनी बात दुसरो के सामने प्रस्तुत नही कर पाता हैं। shyness पे गांधीजी 'my autography'लिखते हैं-My shyness has been in reality my shield and buckler।It has allow me to grow।ये बात मैने उससे कहा भी।
 फिर हम लोग फिजिकल एक्सरसाइज किया जो सभी के लिए बहुत ज़रूरी हैं।किसी महापुरुष ने बोले है 'if you are healthy, you are a successful man.' आज हमलोगों वर्णमाला के बारे में जाना और उसका सही उच्चरण कैसे होता है।आज हमलोग 'क और क़' के सही उच्चरण जाना।फिर हमलोग ब्रेथ की 8-10 कविताएं पढ़े और कविता के महत्व के बारे में जाने की कविता कैसे बहुत कम शब्द में बहुत कुछ कह जाती हैं। फिर हमलोग साथ में किलकारी में नाटक(तो-तो चांद)देखने गए।जो जापान के बच्चों पे आधरित हैं

सुशांत कुमार : आज रंगशाला पहुँचने में थोड़ा बिलंब हो गया आज मैं 8:10 बजे रंगशाला पहुँचा। पहुंचे पर पाया कि हमारे गुरु जी अभिनेता के टॉपिक पर कुछ बात कर रहे थे। पर मैं थोड़ा बिलंब से पहुँचा था इसलिए टॉपिक को अच्छे से समझ नही पाया।
उसके बाद हमलोगों ने पूरे ग्रुप के साथ रनिंग किया। रनिंग के बाद हमलोगों ने स्ट्रैचिंग और वेट शिफ्टिंग एक्सरसाइज किया। आज हमलोगों ने कुछ नये नये एक्सरसाइज भी किए जो मुख्य रूप से बॉडी के सहनशक्ति (स्टैमिना) को बढ़ाने के लिए था।
इसके बाद गुरु जी ने स्वर और व्यंजन के बारे में बिस्तार से जानकारी दी। आज हमलोगों ने क और क़ को भी विस्तार से जाना एवम उसको सही से उच्चारण करना सीख। इसके बाद गुरु जी ने कविता के बारे में बताया और बर्तोल्त ब्रेख्स के कुछ कविता से रूबरू भी करवाया। गुरु जी ने ये भी बताया कि एक एक्टर को क्यूँ कविता पढ़ना चाहिए। गुरु जी ने यह भी बताया कि एक एक्टर को कभी भी अपने आप को रिप्रेजेंट करने से नही भागना चाहिए। उसके अलावा और भी अच्छी अच्छी बातों के साथ आज का हमारा क्लास यही पे समाप्त हो जाता है।
 आज मैंने 3 नाटक देखा।
1. तोतो चैन, जो कि एक जापानी नाटक का हिंदी रूपांतरण था। यह नाटक किलकारी के छोटे बच्चों द्वारा खेल गया। यह नाटक बच्चों की शिक्षा के उपर आधारित था। एक छोटा बच्चा को जिस काम मे रुचि हो अगर उसे उस काम को करने के लिए मोटिवेट किया जाए तो वो उस बिधा में बहुत आगे निकल सकता है। साथ साथ अगर बच्चों को कला के माध्यम से कुछ सिखाया जाए तो वे ज्यादा रुचि लेकर सीखते है।
2. शंबूक वध, इस नाटक के बारे में मैं कुछ नही बोलूंगा क्युकि नाटक मैं पूरा नही देख पाया।
3.झांसी की रानी, यह कहानी झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई के वीरता के ऊपर आधारित था। नाटक में लक्ष्मी बाई के वीरता एवं उनके बहादुरी को दिखाया गया है। किस तरह रानी लक्ष्मी बाई अपने राज्य झांसी को अंग्रेजो के अत्याचार से बचाते बचाते वीरगति को प्राप्त हो जाती है।
अपने कुछ विश्वासघाती सैनिको के कारण अपने राज्य को अंग्रेजों के अत्याचार से नही बचा पति है।

चन्दन कुमार : मैं रोज़ सुबह की शुरुआत किताब पढ़ के करता हूँ।आप के जानकारी के लिए में बतादूँ की मैं अभी 'भगत सिंह और उनके साथियों का दस्तावेज' पढ़ रहा हूँ। इस किताब में गरम दल के नेता आज़ादी के लिए कैसे काम करते थे और उनका क्या सोच था आज़ादी के लिए उसके बारे में ज़िक्र किया गया हैं।इसमें ऐसे-ऐसे क्रांतिकारी के बारे में ज़िक्र किया गया हैं जिनका नाम मैं पहली बार सुना हूँ।जैसे-शहीद कर्तार सिंह सराभा(इन्हें भगत सिंह अपना गुरु मानते थे और इनका चित्र अपने पास रखते थे),गुरु राम सिंह - आगे कल।
जब मैं लगभग 8:10 रंगशाला पहुँच तो हमारे साथी 'राकेश' की लेखनी पर चर्चा चल रही थी।उसकी समस्या ये है की वह शर्मिला हैं और इसके कारण वह अपनी बात दुसरो के सामने प्रस्तुत नही कर पाता हैं। shyness पे गांधीजी 'my autography' में लिखते हैं-My shyness has been in reality my shield and buckler।It has allow me to grow।ये बात मैने उससे कहा भी।
फिर हम लोग फिजिकल एक्सरसाइज किए जो सभी के लिए बहुत ज़रूरी हैं।किसी महापुरुष ने क्या ख़ूब कहा है 'if you are healthy,you are a successful man'।आज हमलोगों ने वर्णमाला के बारे में जाना और उसका सही उच्चरण कैसे होता है।आज हमलोग 'क और क़' के सही उच्चरण के बारे में भी जाना। फिर हमलोग ब्रेख्त की 8-10 कविताएं पढ़े और कविता के महत्व के बारे में जाना की कविता कैसे बहुत कम शब्दो में बहुत कुछ कह जाती हैं।फिर हमलोग साथ में किलकारी में नाटक(तो-तो चांद)देखने गए।जो जापान के बच्चों पे आधरित हैं।

अनुज कुमार : आंख खुलती है और मै अपने फ़ोन में देखता हूं कि 7:12 बज गया है ,मैं जल्दी से उठा और भाग कर सारे नित्य क्रिया से निर्वित हो कर साइकल उठा कर चलदिया रंगशाला आज मैं थोड़ा डरा हुआ था क्योंकि कहि देर न हो जाए इसलिए मैं साइकल की स्पीड थोड़ी बढ़ा दी और पहुँचा तो देखा कि मेरे गुरुजी सहित सारे लोग(मेरे मित्र) वहाँ पहले से ही उपस्थित है जैसे ही मैं वह पहुँचता हूँ तो कुछ दोस्तों मुझे अजीब ढंग से देखते है क्योंकि आज लंबे बाल -दाढी वाला लड़का एक दम छोटे छोटे बाल और दाढी में दिखाई देता है मुझे भी थोड़ा अजीब लगता है लेकिन सर के मुंह से निकलता है हा अब ठीक है (मेरे चेहरे को देख कर) फिर शुरू होता है अभ्यास सत्र जिसमे आज हर रोज़ की तरह बॉडी स्ट्रेचिंग, रनिंग,आदि कर के आज एक नए अभ्यास से रूबरू होते है "पता हिलाओ अभ्यास" जो मेरे अनुसार सांस और वॉइस को थ्रो कैसे करे इसी का अभ्यास था जिसमे हम और हमारे मित्र एक गोले में बैठ कर अपने मुह की हवा से बीच मे रखे पते को हिलाने का प्रयास करते है एक अभिनेता के लिए सांस और आवाज़ उसका सबसे बड़ा हथियार होता है , अभयास का सत्र अध्ययन की ओर चलता है और हमे बताया जाता है कि एक अभिनेता को कविता ज़रुर पढ़ना और समझना चाहिए, क्योंकि एक छोटी सी कविता बहुत बड़ी बड़ी बात कह जाती है। जब आप कविता समझने लगेंगे तो सवांद को भी समझने में आसानी होगी। और तब आप संवाद के text को देख कर उसके subtext को समझ सकते है उस मे taxt कम होते है। और फिर हमने कुछ कविताए पढ़ा , कुछ ख़ास समझ मे नही आई लेकिन किसी चीज़ को समझना है तो शुरुआत तो करनी पड़ेगी। किसी ने कहा है कि दूरी चाहे जितनी भी हो शुरुआत पहले कदम से ही होती है। तो हमने भी पहला कदम रखा और उस दूरी को तय करने की ठान ली आज एक ओर बात मुझे अच्छा लगा जो मैं लिख रहा हु की जो कुछ हमारे कार्यशाला में बताया जा रहा है जो कुछ भी हम यहाँ कर रहे है चाहे ये शारिरिक अभ्यास हो या अध्ययन अभ्यास हो उसे हम रोज़ करे तभी ये सार्थक होगा,अभ्यास का सत्र यहाँ समाप्त होती है।
और हम अपने मित्र के साथ किलकारी बाल भवन जाते है जहाँ आज से थिएटर फेस्टिवल की शुरुआत होती है और हम वहाँ देखते है जापानी कहानी के हिंदी रूपांतरण नाटक "तोतो चान" बहुत अच्छा लगा बच्चो को इस तरह अभिनय करते देख कर। ये पहली बार था कि मैं किलकारी बाल भवन में गया था वहाँ की अनुशासन देख कर भाव विभोर हो गया जैसे कि सभागार में आप जो हो या आप चीफ़ गेस्ट हो या कोई भी आपको जूते उतार कर ही प्रवेश करना है। अच्छा लगा वहाँ के बच्चों को देख कर। काश हम भी बचपन मे यहां होते यही मन कर रहा था।
ये लेखनी में जो कुछ गलती हो उसके लिए क्षमा प्राथी हूँ.

शनिवार, 6 अगस्त 2016

लोग टिकट खरीदकर नाटक क्यों नहीं देखते! : एक बहस

बहस की श्रृंखला के रूप में मैंने सोशल मिडिया पर लिखा “मैं रंगमंच में वैसे निर्देशकों, नाट्यदलों और आयोजकों का कायल हूँ जो अपने नाटकों में बिना टिकट कटाए अपने करीबी से करीबी रिश्तेदारों, दोस्तों और रंगकर्मियों तक को सभागार में घुसने नहीं देते। इसके बावजूद उनके नाटकों में दर्शकों की कोई कमी नहीं होती।
रंगमंच से पास या कार्ड सिस्टम खत्म होकर, टिकट सिस्टम लागू होना चाहिए साथ ही नाटकों का प्रोडक्शन रेट तय हो। फ़ोकट में एक दूसरे की वाह वाह और हाय हाय करने से दरिद्रता का ही साम्राज्य बना रहेगा और रंगकर्मी इस या उस ग्रांट/डोनेशन/चंदा के चक्कर में अपनी ऐसी-तैसी कराता रहेगा।
किसी भी कला को अगर स्वाबलंबी बनना है तो उसे हर क्षेत्र में अपने पैरों पर खड़ा होना ही होगा। तभी आप निडर होकर काम कर सकते हैं।
भाई, पास न मिलने पर मुंह फुलाना बंद करो। नाटक किसी का भी हो, यदि देखना है तो टिकट कटाओ।
खूब मेहनत से नाटक बनाओ। नाटक से कमाओ - नाटक में लगाओ, टिकटवाले दर्शक बनाओ और जो बचे उसे बांटकर खाओ।”
जो कुछ प्रतिक्रियाएं मिलीं वह निम्न हैं। - माडरेटर मंडली

उमेश आदित्य - बात आपकी है 100% सही श्रीमान, लेकिन छोटे शहरों में कैसे चले काम? चंदा जहाँ उठा लेते हैं नेताओं के गुर्गे सारे, दस बीस हज़ार जुटाने में भी फटती है प्यारे, नेताओं के पिछलग्गू उठाते, लाखों -लाख की राशि, सही काम करने वाले करते फाकाकसी, पर बात आपकी सचमुच अच्छी लगती है, रंगमंच के दिन ऐसे ही सुधरेंगे, जब लोग हमारे टिकट ले नाटक देखेंगे।

पुंज प्रकाश - छोटे शहरों और गाँव में लोग फ़िल्म के लिए पैसे निकालते हैं, dth के लिए पैसे निकालते हैं, मोबाईल में बैलेंस और नेट पैक के लिए भी अब पैसे निकाल रहे हैं तो नाटक के लिए क्यों नहीं निकालेगें। प्रयास तो किया जाय, मुश्किल है लेकिन असंभव तो बिलकुल भी नहीं।

दिनेश चौधरी - अब जरा इसके दूसरे पहलू को देखें। अपने पड़ोस में जिला मुख्यालय राजनांदगांव है। मुक्तिबोध का शहर। कई सालों से नाटकों से वंचित। यहाँ नाटक करने जाएँ तो टिकिट सेल नहीं होगी। आयोजक डूब जायेगा। डोंगरगढ़ में हो सकता है। तो इसका मतलब ये हुआ कि टिकिट वाले रंगमंच की जमीन शौकिया थिएटर को ही तैयार करनी है। फिर हमारा अनुभव जुदा है। जो हजार रूपये का चन्दा देते हैं वो नाटक देखने नहीं आते। 500 वाले आते हैं। इन सबकी संख्या 40-50 के आसपास है, जिनसे 50-60 हजार निकल आते हैं। इतने टिकिट बेच पाना असम्भव है। सनद रहे कि यह बात छोटे कस्बे के संदर्भ में कही जा रही है, तो यह मसला शहर से जुदा हो सकता है। हाँ, अगर हम टिकिट बेचकर रंगकर्म करते हैं तो हम दर्शक के प्रति जवाबदेह हो जाते है और नाटक की गुणवत्ता में सुधार आ सकता है। कम से कम शिल्प में। बाकी कंटेंट तो जाहिर है की अंततः कंज्यूमर ही तय करेगा!

पुंज प्रकाश - सर, किसी भी शहर, गाँव, क़स्बा में एक लम्बी प्रक्रिया से ही बदलाव संभव है। शौकिया रंगमंच यदि लाख - लाख रुपए चंदा कर सकता है तो किसी भी नाटक का टिकट भी आसानी से बेच सकता है। अपने यहाँ (खासकर हिंदी बेल्ट में) समस्या यह है सर कि हमने रंगमंच को फ्री में, चन्दा से, या अनुदान आदि से स्वचालित होने वाली चीज़ में परिवर्तित कर दिया है। दर्शक और उसके पॉकेट पर ज़्यादा काम हुआ ही नहीं है। शायद यही वजह है कि हम हमेशा ही अभावग्रस्त हैं। और यह काम किसी एक के चाहने से होगा भी नहीं बल्कि सबको साथ आना होगा। हाँ, यह रिश्ता माल और कन्ज्यूमर वाला नहीं होना चाहिए बल्कि कला और उसके प्रोत्साहन और प्रश्रय वाला बनाना होगा। सार्थक कला को प्रोत्साहित करने वाले लोग हैं सर और नहीं हैं या कम हैं तो उहें गढ़ने का काम भी चले।

पप्पू तरुण – ऐसे क़दम हर हाल सही है, आख़िर इस आर्थिक समाजिक ब्यवस्था में बीना अर्थ के न रंग आऐगा, न कर्म हो पाऐगा

अनिमेष जोशी - इसलिए मैंने नाटक देखना काफी कम कर दिया है। दो साल में बहुत करीब से देखा है। आपकी बात का मैं समर्थन करता हूँ।

राजेश चंद्र - सहमत। इसे अमल में लाया जाना निहायत ज़रूरी है।

राज शर्मा – कारण है नाटकों की गुणवत्ता और इन्टरटेनमेंट टेक्स।

रेखा सिंह – रंगमंच को हर तरह से समृद्ध और लोकप्रिय बनाने के लिए इस टिकट व्यवस्था को लागू करना ज़रुरी है।

डॉक्टर सत्यदेव - आपकी बातों से सहमत हूं,मगर फिर भी जुगारुलालों को तो पास चाहिए ही चाहिए।

अभय अवस्थी - सबसे बड़ी जो दिककत है, कि आजकल कोई भी नाटक कर सकता है, उसकी क्वालिटी 200 rs के टिकट की है या नहीं ये कोई डिसाइड नहीं करता।
उदाहरण के लिए : पहली बार जो नाटक देखने जा रहा है 200 रूपए का टिकट। पेट्रोल वगैरह और अपना कीमती वक्त देकर - - हम उसे दे क्या रहे हैं? अब पहली बार में मैंने 200 का टिकट खरीदकर देखा, नए लड़के थे जिन्हें हम एमोच्योर कहते हैं, वो सिखा रहे थे लेकिन मैंने तो 200 दिया ना। नाटक का स्तर ऐसा कि 10 मिनट बाद मुझे लगा कि इससे अच्छा तो किताब लेके पढ़ लेता। 50 रूपया बचता तो कुछ खाया भी जा सकता था।
अब चुकी मेरा पहला ही अनुभव ऐसा था तो यही अनुभव मैंने दस को बताया और दो टीन गलियां भी साथ में जोड़ दीं। विजय तेंदुलकर जी कहते हैं इस दुनिया का जितना नुकसान कुटिल लोगो ने नही किया उससे कहीं ज्यादा मूर्खों ने किया है। मार्केटिंग का नियम है is the product worth xyz selling price ?

पुंज प्रकाश - नाट्यकला और उस क्षेत्र में काम करनेवालों के बारे में थोड़ी जानकारी रखने से शायद ऐसी घटनाओं से बचा जा सकता है।

अनिल शर्मा - आपकी बात सही है ,किसी भी कला को मारना हो ,,खत्म करना हो तो उसे राजकीय सहयोग से जोड दो ,धीरे धीरे खुद खत्म हो जायेगी ,और यही हो रहा है

अनघा देशपांडे – यह सही है। पर बहुत मुश्किल है। गोवा में तो इतनी आदत हो चुकी है लोगों को - - डर लगता है टिकट रखने को भी!

पुंज प्रकाश - कोशिश तो किया ही जाना चाहिए। ठीक है कम लोग आएंगें। कोई बात नहीं। बल्कि एक ही आदमी आए लेकिन टिकट लेकर। मैं ऐसे कई ग्रुप को जानता हूँ जिसके बारे में लोग यह जान गए हैं की इनका नाटक देखना है तो टिकट लेना ही पड़ेगा।

राज शर्मा – एक बात और – इंटरटेमेंट टेक्स के बजाय इनकम टेक्स लगना चाहिए, वो भी 5%। सारे खर्चे निकालने के बाद। इससे लागत के बाद producer की हिम्मत दुबारा शो करने की पड़ेगी। एक खास बात बताऊँ – कोई भी कलाकार किसी एक नाटक में अभिनय क्या कर लेता है अगली बार खुद निर्देशक बन जाता है।

अविनाश दास - मुंबई में पिया बहुरूपिया के सारे शो एक हफ्ते पहले से बुक माइ शो पर सोल्‍ड आउट (हाउसफुल) थे। जबकि चार दिन तक शो थे लगातार। शनिवार और रविवार को तो दो दो शो थे। मैं स्‍वानंद किरकिरे से कहा, तो उन्‍होंने गीतांजलि कुलकर्णी के जरिये दो टिकट किसी तरह काउंटर पर रखवा दिया। आमतौर पर लोग इस व्‍यवस्‍था को पास समझने की भूल कर बैठते। लेकिन टिकट रखवाया, जिसका मूल्‍य चुकाने के बाद ही वह मुझे मिलता। पांच सौ रुपये के टिकट थे और मैंने हज़ार रुपये देकर दोनों टिकट ख़रीदे, तभी नाटक देख पाया।

विवेक कुमार तिवारी – मुझे लगता है कि जो नाटक सामान्य तरीके से खेले जाते हैं, वो लोकप्रिय होते हैं। जहाँ एक्सपेरीमेंट की बात आती है, दर्शक उब जाते हैं। हमने अपने नाटकों के लिए कुछ खास किस्म के दर्शक तैयार किए हैं और उन्हीं के फीडबैक में चलते हैं लेकिन आम आदमी यदि रंगमंच को एक्सेप्ट करता है तो यह समस्या कुछ खास नहीं – टिकट बिकेंगे। बस ज़मीनी हकीकत को पहचानना पड़ेगा।

पुंज प्रकाश - प्रयोग नाटक की आत्मा है, वह होते रहना चाहिए। प्रयोग से ही कोई भी कला या समाज आगे बढ़ता है। हाँ, प्रयोग सफल-असफल दोनों प्रकार के होंगें। होने भी चाहिए। प्रयोग से ही नवीनता बनी रहती है। इससे घबराने की ज़रूरत नहीं है।
यह सही है कि हम जो खाते रहे हैं उसी को खाने में सहजता महसूस करते हैं लेकिन अलग अलग प्रकार के बेहतरीन टेस्ट और भी हैं दुनियां में, उसे भी आजमाने में कोई बुराई नहीं।

विवेक कुमार तिवारी – मैंने दर्शकों के नज़रिए से कहा, आप मेरी बातों को समझें। देखिए, लोक नाटकों में बिदेसिया या हबीब साहेब के नाटकों पर बात करें तो आसानी से स्वीकार किया जाता है, वो सहजता से नाटक करते हैं।

पुंज प्रकाश - विवेक भाई, दर्शकों के पसंद में बहुत विविधता है। हम दावे से यह कह ही नहीं सकते कि ऐसे नाटक ही लोगों को पसंद आते हैं। और फिर हबीब साहेब के काम और बिदेसिया में बहुत प्रयोग है, वो प्रयोग सफल हो गए इसलिए हम उसका नाम लेते हैं। और फिर यह ज़रूरी नहीं कि हर रंगकर्मी लोकशैली का ही नाटक करे। नाटक की कई अन्य शैलियाँ भी हैं, उसपर भी काम होगा ही। नई शैली विकसिक करने का प्रयास और प्रयोग भी होगा ही।
दरअसल, हम किसी भी नए प्रयोग से घबराने वाले लोग हैं और उसे तबतक स्वीकार नहीं करते जबतक वो सफल नहीं हो जाता।

सुब्रो भट्टाचार्या - मुझे लगता है एक सेंसर कमीटी जैसी चीज़ भी होनी चाहिए जो ये तय करें की ये नाटक प्रस्तुति के लायक है या नहीं।अन्यथा कई बार पैसा देकर देखने वाला ही हमारा दुष्प्रचारक बन बैठेगा। स्तर के आधार पर टिकट लगाने में कोई बुराई नही है।

प्रभात सौरव – नाटक का ग्रेड तय करने के लिए कमिटी हो, पर उस कमिटी में कौन हों? पटना रंगमंच में सहमति की तरह हर तरह की स्थिति है।