रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

रविवार, 20 नवंबर 2011

अपने पति की नज़र में मैं रंडी थी.


असीमा भट्ट
असीमा भट्ट

कितनी अजीब बात है जब मैं पत्रकारिता करती थी, लोगों से साक्षात्कार लेती थी और उनके बारे में लिखती थी और जब कुछ खास नहीं होता था तो खीझ कर कहती थी-कहानी में कोई डेप्थ नहीं है संघर्ष नहीं है ! मजा नहीं आ रहा, क्या लिखूं? आज जब अपने बारे में लिखने बैठी हूं तो बड़े पसोपेश में हूं, अपने बारे में लिखना हमेशा कठिन होता है. कहां से शुरू करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा. यह जीवनी नहीं है. हां मेरे जीवन की कड़वी हकीकत जरूर है. कुछ कतरनें हैं, जिन्हें लिखने बैठी हूं. बहुत दिनों से कई मित्र कह रहे थे-अपने बारे में लिखो. पर हमेशा लगता था, अपना दर्द अपने तक ही रहे तो अच्छा. उसे सरेआम करने से क्या फायदा?

लेकिन सुधादी के स्नेह भरे आग्रह ने कलम उठाने पर मजबूर कर दिया क्योंकि यह सच है कि जिसे मैं अपनी निजी तकलीफ मानती हूं, सिर्फ अपना दर्द, वह किसी और का भी तो दर्द हो सकता है. लोहा-लोहे को काटता है इसलिए यह सब लिखना जरूरी है ताकि एक दर्द दूसरे के दर्द पर मरहम रख सके. हो सकता है, जिस कठिन यातना के दौर से मैं गुजरी हूं, कई और मेरी जैसी बहनें गुजरी हों, और शायद वे भी चुप रह कर अपने दर्द और अपमान को छुपाना चाहती हों. या अब तक इसलिए चुप रही हों कि अपने गहरे जख्मों को खुला करके क्या हासिल? खास करके जब जख्म आपके अपने ने दिये हों. वही जो आपका रखवाला था. जिसे अपना सब कुछ मान कर जिसके हाथों में आपने न केवल अपनी जिंदगी की बागडोर सौंप दी बल्कि अपने सपने भी न्योछावर कर दिये.

बिहार के एक प्रतिष्ठित परिवार में मेरा जन्म हुआ. मेरे दादा जी अपने इलाके के जाने-माने डाक्टर थे और उनका सिनेमा हॉल और ईंट के भट्ठे का कारोबार था. समाज में हमारे परिवार का बहुत नाम और इज्जत था. मेरे नाना जी स्वयं जमींदार थे. उनकी काफी खेती-बाड़ी और काफी तादाद में पशु (गाय-बैल और भैंस) थे. पिता जी कम्युनिस्ट थे. बनारस विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. छात्र जीवन से ही वे क्रांतिकारी हो गये. उन्होंने सरकारी तंत्र का कड़ा विरोध किया, जिसके लिए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा. लंबे समय तक उन्हें जेलों के यातनाघर (सेल) में रखा गया. बाद में उनके साथियों ने उनके लिए केस लड़ा और पिता जी जेल से बाहर आये बाद में जेपी आंदोलन में भी वे काफी सक्रिय रहे. मैं अपने माता-पिता की शादी के 14 साल बाद पैदा हुई थी. मेरे जन्म के बाद मेरे चाचा जी ने कहा था, इतने दिनों बाद हुई भी तो बेटी. इस पर मेरे पिता जी हमेशा कहते हैं-क्रांति मेरी ताकत है. मेरा विश्वास है. उन्हें मुझ पर बहुत गर्व था. वे कहते थे एक दिन आयेगा जब लोग कहेंगे देखो वह क्रांति का पिता जा रहा है.

दुनिया में कोई भी शादी इसलिए नहीं होती कि उसका अंजाम तलाक हो. शादी किसी भी लड़की की जिंदगी की नयी शुरुआत होती है. नये सपने, नयी उम्मीदें, नयी उमंगें, बचपन में हर लड़की अपनी दादी-नानी से परियों की कहानी सुनती है. एक परी होती है और एक दिन सफेद घोड़े पर सवार एक राजकुमार आता है और परी को ले जाता है. दुनिया की शायद ही कोई लड़की हो, जिसने ये सपने न देखे हों-सिंड्रेला की तरह.

मेरी शादी पांच जुलाई, 1993 को पटना में हुई. मेरे पति आलोकधन्वा एक प्रतिष्ठित-सम्मानित कवि हैं. खास तौर से संवेदना और प्रेम के कवि. हमारी शादी कई मायनों में भिन्न थी. जाति-बिरादरी के अलावा हमारी उम्र में लंबा अंतराल था. लगभग 20-22 साल का. शादी के वक्त मेरी उम्र 23वर्ष थी और उनकी 45 वर्ष. बड़ी उम्र होने की वजह से हमेशा उनमें एक कुंठा रहती थी. लेकिन शादी के बाद मैंने उम्र को कभी तूल नहीं दिया. प्यार किया तो पूरी तरह से डूब कर प्यार किया. पूरी शिद्दत, पूरी ईमानदारी से. मैं काफ़ी बागी किस्म की लड़की थी. बगैर उनके उम्र और दुनिया की परवाह किये मैं सरेआम, खुली सड़क पर उन्हें गले लगा कर चूम लेती थी और वे झेंपते हुए कहते-तुम प्रेमिकाओं की प्रेमिका हो.

हमारा प्रेम कुछ इस तरह परवान चढ़ा. छोटे शहरों में आज भी रंगमंच के क्षेत्र में कम ही लड़कियां आगे आती हैं. पटना में भी इस क्षेत्र में इनी-गिनी लड़कियां ही थीं. मैं भी उनमें से एक थी. उन दिनों उनकी बेहद मशहूर कविता भागी हुई लड़कियां का मंचन होना था. इसका मंचन संभवतः मई 1993 में हुआ था. उसी दौरान हमारी मुलाकात हुई. मैंने उनकी कविता में भूमिका भी की. शुरू-शुरू में हमारी उस कविता को लेकर बहुत बहस होती थी. अकसर मैं कविता को बारीकी से समझने के लिए पूछती, आखिर आपने यह पंक्ति क्यों लिखी? और वे हंसते हुए जवाब देते-मैंने तुम जैसी लड़कियों के लिए ही लिखा है.

धीरे-धीरे जान-पहचान दोस्ती में बदल गयी. कभी-कभी मैं उनके घर भी जाने लगी. उनकी उम्र को देख कर मुझे हमेशा लगता कि वे शादीशुदा हैं और शायद पत्नी कहीं बाहर रहती हैं या फिर अलग. एक दिन मैंने पूछ ही लिया. आपकी पत्नी कहां रहती हैं. कभी उन्हें देखा नहीं. वे जोर से हंसे और कहा-अरे पगली मैंने शादी नहीं की.

-क्यों?
-इसलिए कि अब तक कोई तुम जैसी पगली मेरी जिंदगी में नहीं आयी. 
-आप मजाक कर रहे हैं.
-नहीं! मैं सच कह रहा हूं. तुमने तो जैसी मेरी कविता को सजीव बना दिया. जैसे यह कविता मैंने सिर्फ तुम्हारे लिए ही लिखी थी.
-आप जैसे कवि को कोई अब तक कोई मिली क्यों नहीं आखिर?
-शायद तुम मेरी तकदीर में थीं.
वे अकसर ऐसी बातें करते और मैं उन्हें बस यों ही लिया करती थी. हां! एक बात जरूर थी कि उनका बात करने का खास अंदाज मुझे बहुत भाता.

मुझे याद है, एक दिन शरतचंद्र के श्रीकांत की अभया और टाल्सटाय की अन्ना कारेनीना  पर बातें हो रही थीं. उन दोनों को देखने की उनकी दृष्टि मुझसे भिन्न थी और मैंने सहमत न होते हुए तपाक से कहा, आपको नहीं लगता, आखिर उन दोनों स्त्रियों (अभया और अन्ना कारेनीना) की तलाश एक ही थी और वह थी प्रेम की तलाश. वे अचानक बोले-तुम्हें पता है जब मर्लिन मुनरो, अन्ना कारेनीना औरइजाडोरा डंकन को एक बोतल में मिला कर हिलाया जायेगा तो उससे जो एक व्यक्तित्व तैयार होगा वह हो तुम. तुम्हारे अंदर की आग ही मुझे तुम्हारे प्रति खींचती है. आज तक मुझे तुम जैसी बातें करनेवाली लड़की नहीं मिली. मुझसे शादी करोगी?
अप्रत्याशित सवाल से मैं चौक गयी-सर मैं आपकी कविताएं पसंद करती हूं. आपकी इज्जत करती हूं, लेकिन शादी के बारे में सोच भी कैसे सकती हूं, आप उम्र में मुझसे कितने बड़े हैं.

-तो क्या हुआ? ब्रेख्त की पत्नी हेलेना भी उनसे लगभग 20 वर्ष छोटी थीं. दिलीप साहब और सायरा जी की उम्र तो बाप-बेटी के बराबर है. दिलीप कुमार तो सायरा बानों की मां नसीम बानो के साथ अभिनय कर चुके थे.
तुमने बंदिनी देखी है?उसमें अशोक कुमार और नूतन का प्रेम देखा है?

-फिर भी मैं ऐसा नहीं कर सकती. मैं अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी हूं. मेरी मां इसके लिए कभी राजी नहीं होगी.
-उन्हें बताने की क्या जरूरत है. आखिर तुम अपनी जिदंगी अपनी मां और भाई-बहन के लिए नहीं जी रही हो. तुम्हारी जैसी खुद्दार लड़की को अपने फैसले खुद लेने चाहिए. तुम्हें अपनी शर्तों पर जीना चाहिए.
-नहीं मैं आपसे शादी नहीं कर सकती - कहती हुई मैं वापस आ गयी.

उन दिनों मैं एक वर्किंग वीमेंस हॉस्टल में रहती थी और पटना से प्रकाशित होनेवाले हिंदी दैनिक आज में काम करती थी. तीन दिन बाद एक बुजुर्ग महिला (मेरे पति की मित्र) मुझसे मिलने मेरे दफ्तर आयीं और बताया कि तुम्हारे आने के बाद से वह गंभीर रूप से बीमार हैं. तुम्हारे ऑफिस में फोन किया लेकिन तुमने नहीं उठाया. तुम्हारे हॉस्टल भी मिलने गया लेकिन तुमने मिलने से मना कर दिया. वह हताश हो गया है. उसे गहरा सदमा लगा है. एक बार चल कर देख लो उसे.  मुझे उनसे शादी नहीं करनी थी इसलिए उनसे मिलने या बात करने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी. मैं उनके साथ ही उन्हें देखने उनके घर आ गयी.

वाकई वे बहुत बीमार और कमजोर लग रहे थे. उस वक्त वहां उनके कुछ मित्र भी थे जो मेरे जाते ही बाहर चले गये. और मेरे कवि पति मेरे पैरों पर गिर कर रोने लगे-मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. तुम नहीं जानतीं तुम मेरे लिए कितनी अहमियत रखती हो. तुम्हारे आने से मेरी जिंदगी को एक नया अर्थ मिला है. मैं तुम्हें हमेशा, हर तरह से खुश रखूंगा.

इतना बड़ा कवि मेरे सामने फूट-फूट कर रो रहा था. मैं स्तब्ध थी और अचानक मेरे मुंह से निकला ठीक है, आपको शादी करनी है तो जल्दी कर लीजिए वरना मेरे घरवालों का दबाव पड़ेगा तो मैं कुछ नहीं कर पाऊंगी. कहने की देर थी और हफ्ते भर में मेरी शादी हो गयी. शादीवाले दिन मेरा मन बहुत उदास था. आखिर मेरी उम्र की लड़कियों की जैसी शादी होती है, वैसा कुछ भी नहीं था. दिल के भीतर से कहीं आवाज उठ रही थी-जो हो रहा है, वह ठीक नहीं है मैं कहीं भाग जाना चाहती थी, ऐसा जी होता था कि किसी सिनेमा हॉल में जा कर बैठ जाऊं ताकि लोग मुझे ढूंढ न पायें. पर मुझे घर से बाहर जाने का मौका नहीं मिला क्योंकि शादी के कुछ दिन पहले से ही मेरे पति मुझे अपने घर ले आये थे, जहां उनकी बहनें लगातार मेरे साथ रहती थीं.

लगातार रोने और मन बेचैन होने से मेरे सर में दर्द था. हमारी शादी एक साहित्य भवन में हुई थी. वहां से घर आ कर मैं जल्दी सोने चली गयी. देर रात तक मेरे पति और उनकी महिला मित्र की आवाजें मेरे कानों में पड़ती रहीं. सुबह जब मैं जागी तो मेरे पति ने मुझसे कहा जाओ-जा कर उनका पैर छुओ.

-किनका? मैं चौंकी.

मैंने देखा, घर में कोई और नहीं था. उन्होंने रात ही अपनी मां-बहन को अपने घर भेज दिया था. थोड़ी देर बाद उनकी बड़ी बहन का फोन आया. उन्होंने पहला सवाल किया, वो मास्टरनिया (वो महिला एक स्कूल में पढ़ाती थी, इसलिए उन्हें सब मास्टरनिया बुलाते थे) रात में कहां थी?
-यहीं हमारे घर पर ही थीं.
-देखो, अब वह घर भी तुम्हारा है और पति भी. अब पति और घर तुम्हें ही संभालना है.
मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि सबने जान-बूझ कर मुझे धोखा दिया. मेरी सास-ननद को सब पता था और सबने मुझे इस आग में झोंक दिया. ऐसी थी मेरी सुहागरात! मैं शादी के पहले दिन ही बुरी तरह से बिखर गयी. मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया. मैं आज तक नहीं समझ पायी आखिर क्यों किया इन्होंने ऐसा?
बाद में मैंने इस पर बड़े धैर्य और प्यार से बात की-सर मैं आपको सर कहती हूं. आपकी बेटी की उम्र की हूं फिर भी आपसे शादी की. लेकिन जब आप किसी और से प्रेम करते थे तो आपने मुझसे शादी क्यों की? आप जैसे इनसान को तो उन्हीं से शादी करनी चाहिए थी, जिससे प्रेम हो.
-मैं उनसे शादी नहीं कर सकता था.
क्यों?
-क्योंकि वह पहले से शादीशुदा हैं. उनके बच्चे हैं, वे उम्र में मुझसे 12 साल बड़ी हैं.

मैं जैसे आसमान से नीचे गिरी. मेरे मुंह से यकायक निकला- यह कहां की हिप्पोक्रेसी है सर? आप 22 साल छोटी लड़की से शादी कर सकते हैं और 12 साल बड़ी स्त्री से नहीं तो फिर आपको उनसे प्रेम संबंध भी नहीं बनाना चाहिए. 

पत्नियां जब ऐसे सवाल करती हैं तो उनका क्या हश्र होता है, शायद यह किसी से छिपा नहीं. सबसे घिनौनी बात यह थी कि मेरे पति अपनी महिला मित्र को सार्वजनिक जगहों पर घोषित रूप से दीदी बुलाते थे. सुना है, पुष्पाजी भी भारती जी को राखी बांधा करती थीं, यह इलाहाबाद में सभी जानते थे. भाई-बहन के रिश्ते का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है?

बाद में एक दिन उन दीदी का 60वां जन्मदिन भी हमारे ही घर पर बड़ी धूमधाम से मनाया गया. एक दिन मैंने उनसे कहा, अगर आप में साहस है तो खुल कर इस रिश्ते को स्वीकारें. मुझे खुशी होगी कि मेरे पति में इतनी हिम्मत है. यह कायरोंवाली हरकत देश के इतने बड़े कवि को शोभा नहीं देती. मैं आपका साथ दूंगी. आप उन्हें सार्वजनिक तौर पर स्वीकारें. लेकिन इसके लिए तैयार होने के बजाय उन्होंने मुझे बाकायदा धमकी दी कि मैं यह बात किसी से न कहूं, खास कर उनके भैया-भाभी और बच्चों से. वह दिन मुझे आज भी याद है, जब पहली बार उन्होंने मुझ पर हाथ उठाया. जो इनसान पहले मुझसे कहा करता था कि तुम्हारे अंदर आग है. तुम्हारे सवाल बहुत आंदोलित करते हैं, आज वही मेरे पत्नी होने के मूल अधिकार के सवाल पर मुझे प्रताड़ित कर रहा था. ऐसे में हर लड़की का आसरा मायका होता है पर मैं तो वह दरवाजा पहले ही बंद कर आयी थी. मैं बड़ी मन्नतों-मनौतियों के बाद पैदा हुई थी. इसलिए मुझे दादी और नानी के घर सभी जगह बहुत लाड़-प्यार मिला. सबके लिए मैं भगवान का भेजा हुआ प्रसाद थी. सबकी चहेती, सबकी लाडली, अपनी मरज़ी से शादी करके मैंने सबका दिल तोड़ था. चूंकि मैं कहीं जा नहीं सकती थी इसलिए छह महीने अंदर-ही-अंदर घुटती रही और सब सहती रही. एक दिन तंग आकर मां के पास चली गयी. हालांकि मुझमें मां को सब सच बताने की हिम्मत नहीं थी कि मेरे साथ क्या-क्या हो रहा है लेकिन वह मां थी. वह अपने आप समझ गयी थी कि मैं इस शादी को तोड़ने का फैसला करके आयी हूं. उन्होंने जो कहा उसने मुझे वापस लौटने पर मजबूर कर दिया. मां ने कहा, हम औरत जात को दो-दो खानदानों की इज्जत निभानी पड़ती है. एक अपने मां-बाप की और दूसरा अपने ससुराल की. अब तुमने जो किया सो किया. अब शादी तो निभानी ही पड़ेगी. वरना लोग क्या कहेंगे? शादी-ब्याह कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल तो है नहीं.

मैं वापस वहीं लौट आयी जहां मेरे लिए एक पल भी जीना मुश्किल था, फिर भी मैंने एक अच्छी पत्नी बन कर घर बसाने की पूरी कोशिश की लेकिन मैं सफल न हो सकी. शायद मैं बंजर धरती पर फूल खिलाने की कोशिश कर रही थी. आज दुख इस बात का है कि जो रिश्ता बहुत पहले खत्म हो जाना चाहिए था उसे मैं सड़ी लाश की तरह घसीटती रही. लहरों के राजहंस में सुंदरी अपने विरेचक (बिंदी) को लगातार इस उम्मीद में गीला रखती है कि उसका पति नंद वापस आ कर उसका श्रृंगार प्रसाधन पूरा करेगा. आखिर सुंदरी हार कर कहती है, मुझे खेद है तो यही कि जितना समय इसे गीला रखना चाहिए था, उससे कहीं अधिक समय मैंने इसे गीला रखा.
मेरा मन कचोटता है-क्यों हर मां सिर्फ अपनी बेटी को ही घर बसाने और बचाने की नसीहत देती है? क्यों घर बचाना सिर्फ औरतों की जिम्मेदारी है? क्यों जब किसी औरत का घर टूटता है तो सारी दुनिया उसे ही कटघरे में खड़ा करती है? क्यों कोई मां अपने बेटे से नहीं कहती कि बेटा, शादी और गृहस्थी की गाड़ी तुम्हें भी चलानी है, कि समाज और खानदान की इज्जत तुम्हारे हाथ में भी है? घर को बचाने की जवाबदेही जितनी पत्नी की है, उतनी पति की क्यों नहीं है? मेरे कई सवालों के उत्तर मुझे आज तक नहीं मिले.

मुझे शादी के बाद पत्नी का कोई अधिकार नहीं मिला. घर के परदों का रंग भी उनकी प्रेमिका तय करती थी. हालांकि आलोक सिनेमा नहीं देखते थे लेकिन एक बार मेरे बहुत जिद्द करने पर जब हम फिल्म सरदारी बेगम देखने गये तो वह अपनी प्रेमिका को भी साथ ले गये और वह हम दोनों के बीच में बैठी. मेरे लिए यह सब असह्य और अपमानजनक था. आलोक से सबसे बड़ी शिकायत मेरी यह रही कि उनमें कभी कोई निर्णय लेने की ताकत नहीं थी. हर बार, हर बात में जो भी करना है, वह उन दीदी से पूछ कर करना. उसे भी मैं नजरअंदाज करती रही, लेकिन मेरे मामलों में उनकी दखलंदाजी दिन पर दिन बढ़ती ही गयी. ऊपर से आलोक हमेशा यह कहें कि वे उम्र में तुमसे बड़ी हैं, कॉन्वेंट में पढ़ाती हैं, उनसें सीखो.

मुझे पहले ही दिन से उस औरत का विरोध करना और एक पत्नी के अधिकार के लिए कदम उठाना चाहिए था. धीरे-धीरे मैं उदासीन और निराश होती चली गयी, जो जैसा चल रहा है, चलने दो. जहां एक ओर मैं आलोक का आत्मविश्वास बढ़ाने का काम कर रही थी, वहीं मेरा अपना आत्मविश्वास मेरे हाथ से छूटने लगा. और तब मुझे लगा कि नहीं, मुझे इस तरह से हार नहीं माननी है. इसलिए मैंने पटना छोड़ने का फैसला कर लिया. ऑफिस, थिएटर और घर के काम में मैं पिसती रहती थी. अकेली, आलोक कभी कोई मदद नहीं करते. खाना बनाना, कपड़े धोना और घर की सफाई. कभी-कभी उनकी बहन मेरे घर आती तो कहती-तोहार घर त आईना एइखन चमकत बा. (तुम्हारा घर तो आईने की तरह चमकता है). एक और बात बताते हुए अब तो हंसी आती है कि जब मैं आलोक के साथ थी तो वे नौकरानी नहीं रखते थे. मैं घर का काम करने के बाद नौकरी करने जाती, फिर शाम को थिएटर करके वापसघर आ कर घर का काम करती. कभी थकी होती तो कहती, आज ब्रेड ऑमलेट या पनीर खा लो, खाना बनाने की हिम्मत नहीं है, तो वे कहते-तुम तो पांच मिनट में खाना बना लेती हो. रात तो अपनी है, थोड़ा देर से ही सही पर खाना तो बनना ही चाहिए. अब जब मैं अलग रहने लगी तो मेरे प्यार का दम भरनेवाला इनसान दो-दो नौकरानियां रखता है. एक नौकरानी का नाम शांति था. जब कभी छुटि्टयों में मैं घर (पटना) जाती तो वह मुझेशांति कह कर पुकारते थे.

मैं अपनी मरज़ी से घर पर किसी को बुला नहीं सकती थी. कभी मेरी मां-बहन मेरे घर आयी तो मेरे पति ने उन्हें अपमानित करके बाहर निकाल दिया. एक बार मेरी छोटी बहन बीमार थी. वह डाक्टर को दिखाने मेरे पास आयी. मैंने जब अपनी बहन को अपने पास रखने का फैसला लिया तो उन्होंने मुझे अपनी भाभी और उसके परिवार के सामने पीटा. एक बार उन्होंने ऐसे ही देर रात को मेरी मां को घर से निकाल दिया. मेरी मां ने एक गंदी धर्मशाला में रात गुजारी जहां पीने का पानी तक नहीं था जबकि मेरी मां ब्लडप्रेशर की मरीज हैं.

बस समय बीतता गया और एक दिन वह भी आया जिसका इंतजार दुनिया की हर औरत करती है. मां बनने का इंतजार ! वह दिन मेरी जिंदगी में भी आया. आलोक को शायद अंदेशा लग गया था. उन्होंने जबरदस्ती मुझे अपनी परिचित डाक्टर शाहिदा हसन के पास भेजा. शाहिदा जी मुझे बेहद प्यार करती थीं. मुझे कभी-कभी लगता वे मेरी मां भी हैं, डाक्टर भी और एक सहेली भी. चेकअप के बाद उन्होंने मुझे मुस्कुराते हुए गले लगा लिया और मुझे मां बनने की शुभकामनाएं दीं. मैं शरमा गयी.

मेरे लिए यह मेरी जिंदगी का पहला और अनोखा अनुभव था. क्लीनिक से घर आते-आते रास्ते भर में न जाने कितने ख्याल मन में दौड़ गये, कितने सपने मैंने बुन डाले. घर जा कर पति से क्या कहूंगी, कैसे कहूंगी. हिंदी सिनेमा के कई दृष्य आंखों के सामने घूम गये. जब एक नायिका अपने पति से कहती है कि मैं मैंने कई दृष्यों की कल्पना की. मेरा होनेवाला बच्चा कैसा होगा. लड़का होगा या लड़की?

घर पहुंची तो दरवाजा खोलते ही मेरे पति चीखे- कहां थी इतनी देर? मैं कब से इंतजार कर रहा हूं चाय भी नहीं पी है मैंने, जाओ, जल्दी चाय बनाओ, और मैं बस मुस्कुराती जा रही थी. मुझे लगा शायद वे मेरे शरमाने से समझ जायें, लेकिन नहीं, हार कर मैंने ही बताया, शाहिदा जी के पास गयी थी. तो? उनके चेहरे का जैसे रंग उड़ गया.
-मैं प्रेगनेंट हूं.
-यह कैसे हो सकता है? यह मेरा बच्चा नहीं है.
इस तरह से मेरे आनेवाले बच्चे का स्वागत हुआ. मैं किस कदर टूटी, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता. बच्चे को लेकर जो सपने मैंने देखे थे, बुरी तरह बिखर गये. रात भर सो नहीं पायी. खाना भी नहीं खाया और रोती रही. सुबह होते ही मैं शाहिदा जी के पास गयी और सब कुछ बताया. उन्होंने मुझे अबॉर्शन की सलाह दी. मैं आज भी नहीं जानती कि मेरा वह फैसला सही था या गलत पर यह सच है कि मुझे आज भी अपने बच्चे को खोने का दुख है. मैं देखना चाहती थी, मेरे गर्भ में जो बच्चा था वह लड़का था या लड़की. देखने में कैसा होता. आज वह होता तो कितने साल का होता.

मैं मां बनना चहती थी पर ऐसे इनसान के बच्चे की नहीं जो अपने बच्चे को स्वीकारना ही नहीं चाहता हो. मैंने कहीं प़ढा़ था, मेल मीन्स प्रोवाइडर एंड प्रोटेक्टर. मेरे मन में हमेशा से अपने होनेवाले पति की बहुत ही सुंदर छवि थी. वह इनसान ऐसा होगा, जो मुझे बेहद प्यार करेगा. मैं उसकी बांह पकड़ कर चलूं तो लगे कि सारी दुनिया मेरे साथ चल रही है. वह मेरी ताकत और आत्मविश्वास बनेगा. लेकिन यहां तो मैं ऐसे इनसान के साथ रह रही थी, जिसके बदन से हमेशा दूसरी औरत की बू आती थी. न मुझे मेरा घर अपना लगा था, न बेडरूम. सब कुछ बंटा हुआ. हर वक्त किसी दूसरी औरत की मौजूदगी मेरे मन को सालती रहती थी. बच्चे के आने की खबर से अपनी टूटती गृहस्थी बचाने की उम्मीदें जितनी बढ़ गयी थीं, इस घटना के बाद मैं उतना ही टूट गयी. आज तक अपने पर लगा आरोप और उससे पैदा हुआ अपमान नहीं भूलती. आज भी पूछती हूं अपने पति से किसका बच्चा था वह, मुझे तो नहीं पता, तुम्हें पता हो तो तुम्हीं बतला दो. औरत के लिए दुनिया की सबसे गंदी गाली है कि उसे अपने बच्चे के बाप के बारे में मालूम न हो. सिर्फ कुतिया ही नहीं जानती कि उसके पिल्लों का बाप कौन है. मुझे खुद से नफरत हो गयी थी. मेरे भीतर की स्त्री, प्रेम, संवेदना सब कुछ जैसे एक झटके में समाप्त हो गये. मुझे किसी का छूना तक अच्छा नहीं लगता. नतीजतन हमारे बिस्तर अलग हो गये. एक ही छत के नीचे रहते हुए भी हम अलग-अलग कमरों में बंट गये. लेकिन दुनिया के सामने एक अच्छी पत्नी बने रहने में मैंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. इस सबके बावजूद उनके स्वास्थ्य का, खाने-पीने में उनकी पसंद-नापसंद का हमेशा ध्यान रखा. कब उन्हें खाने में दही चाहिए, कब पपीता, कब छेना, कब केला और कब सलाद तो कब शाम को ग्रीन लेबल चाय और साथ में नाइस बिस्किट. आज भी मुझे उनकी सारी दिनचर्या याद है, जबकि हमें अलग हुए छह साल बीत गये.

बड़ा मुश्किल हो रहा है आगे लिखना. ऐसा लगा रहा है जैसे मैं ऑपरेशन थियेटर में लेटी हूं और मेरे जख्मों की चीर-फाड़ हो रही है. दुबारा उसी दर्द, उसी यातना से गुजर रही हूं.

मैंने जिस इनसान से शादी की, उसकी और हमारी उम्र में दो दशक का फासला था. शादी की एक रात में ही मैं अपने 20 साल पीछे छोड़ आयी. बीच के वे साल मैं जी नहीं पायी. अचानक मैं 20 साल बड़ी हो गयी. मैं अचानक अपनी उम्र के बराबर के लोगों की चाची-मामी और नानी-दादी बन गयी. बड़ा अजीब लगता, मुझे जब मेरे पिता या चाचाजी के उम्र के लोग मुझे भाभी बुलाते या मुझसे मजाक करते. एक बात और मैंने गौर की, मेरे पति को किसी से भी मेरा हंस कर बात करना अच्छा नहीं लगता. मैं उनके दोस्तों या परिवार या रिश्ते के भाई या बहनोई से सिर्फ इसलिए ठीक से बात करती क्योंकि यह एक स्वाभाविक कर्टसी है कि घर आये मेहमानों से ठीक से या तहजीब से बात की जाये, जबकि मेरा अपना कोई दोस्त, परिचित या परिवार का सदस्य मेरे घर नहीं आता था, क्योंकि मेरे पति को पसंद नहीं था इसलिए मैंने सबसे नाता तोड़ लिया था. उनके ही परिवार के सदस्यों की और मित्रों की मैं खातिर-तवज्जो करती और उनके जाने के बाद ताने मिलते कि मैं बड़ा हंस-हंस कर बात करती हूं. इस तरह के आरोप मुझे बहुत सालते पर मैंने ये बातें किसी को नहीं बतायीं. सब कुछ चुपचाप सहती और बरदाश्त करती रही. उनकी भाभी, मुझे प्यार से बेटी बुलाती थीं, क्योंकि उनकी बेटी मेरे बराबर की थी. मुझे भी उनका इस तरह प्यार से बुलाना अच्छा लगता था. मैं उन्हें मां समान मानती थी. एक दिन उनसे रोते हुए मैंने कहा- भाभी हमारा घर बचा दो. हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं है. हम सिर्फ दुनिया की नजर में पति-पत्नी हैं.
उन्होंने बस इतना कहा-देखो यह तुम्हारा पर्सनल मैटर है. तुम खुद ही इसे सुलझाओ.
अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा था. शाहिदा जी के पास अक्सर जाती थी. वहीं मुझे जरा तसल्ली मिलती थी. कई बार उन्होंने मेरे पति से बात की, उन्हें समझाने की कोशिश की पर सब बेकार.
जहां तक एक कवि और उनकी कविता से प्रेम का संबंध है तो वह मुझे आज भी है. मैं उनकी बातों और कविता की मुरीद थी. वे बातें करते हुए मुझे बहुत अच्छे लगते. ऐसा लगता है- 'इत्र में डूबे बोल हैं उनके, बात करे तो खुशबू आये.'

मेरे द्वंद्व और दर्द का एक बड़ा कारण यह भी था कि जो इनसान घर से बाहर अपनी इतनी सुंदर, शालीन, संभ्रांत, ईमानदार, नफासतपसंद छवि प्रस्तुत करता है वही घर में सिर्फ मेरे लिए इतना अमानवीय क्यों हो जाता है? बात-बात पर ताने, डांट! कई बार इस कदर जीना दूभर कर देते कि मैं खुद दीवार से अपना सिर पीट लेती. अपने आपको कष्ट देती. एक बार याद है, मुझे आफिस जाने के लिए देर हो रही थी. उनके लिए पीने का पानी उबालना था. यह रोज का सिलसिला था. लगभग आधे घंटे पानी उबालना, जब तक पतीली के तले में सफेदी न जम जाये. मैं जल्दी में थी, इसलिए ज्यादा देर पानी उबालना संभव नहीं था कि तभी वे अपनी तुनकमिजाजी के साथ बहस लेकर बैठ गये-'तुम्हारा ऑफिस कोई पार्लियामेंट नहीं है जो समय पर जाना जरूरी है. पहले पानी घड़ी देख कर आधा घंटा उबालो.'

-आपको क्या लगता है, डिसिप्लीन सिर्फ पार्लियामेंट में होना चाहिए और बाकी कहीं नहीं?
इसी बात पर उन्हें गुस्सा आ गया और उन्होंने चिल्लाना शुरू कर दिया. मैंने गुस्से में पूरा उबलता हुआ गरग पानी का पतीला अपने ऊपर उंड़ेल लिया, लेकिन उन पर कोई असर न हुआ. इस तरह की अनगिनत घटनाएं हैं, जहां मैं अपने आप को ही यातना देती रही
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आखिरकार मैंने अपने पिता जी (मेरे पिता मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के मेंबर हैं. पूरा जीवन उन्होंने समाज सेवा में बिताया) से बात की. उन्होंने कहा-भूल जाओ उसे और अपने पैरों पर खड़ा होना सीखो.
मैंने एक बच्चे की तरह गिड़गिड़ाते हुए अपने पति से तलाक मांगा- सर अब आपके साथ मेरा दम घुटता है. मुक्त कर दीजिये मुझे. हम आपसी समझ से तलाक ले लेते हैं.

उनके लिए मेरा यह कहना असहृय था. उन्होंने अपने माता-पिता की दुहाई दी-अपने बूढ़े माता-पिता को इस उम्र में मैं कोई सदमा नहीं पहुंचा सकता. मेरे भाइयों के बच्चों की शादी नहीं होगी. लोग क्या कहेंगे? मेरी क्या इज्जत रह जायेगी? मैं ने इस उम्र में शादी की. तुम पूरी दुनिया में मेरी पगड़ी उछालना चाहती हो

अब तो उनके माता-पिता को गुजरे भी बहुत समय हो गया लेकिन वे आज तक तलाक को टालते आ रहे हैं. मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. मैं जिस इनसान को जानती थी, वह तो एक कम्यूनिस्ट था, लेकिन यहां मैं एक रूढ़िवादी सामंती पति को देख रही थी-साहब, बीबी और गुलाम के एक ऐय्याश और घमंडी पति की तरह, मैं एकदम से सब कुछ हार गयी थी. मेरा तो जैसे सब कुछ खत्म हो गया. वो कवि भी नहीं रहा, जिसे मैं प्यार करती थी. मेरे लिए वह दुनिया के बेहतरीन कवि थे, जिसकी कविता में मुझे झंकार सुनायी देती थी. आज मेरी ही जिंदगी की झंकार खो गयी. मैं कुछ भी नहीं बन पायी. न पत्नी, न मां. क्या थी मैं? अस्तित्व का सवाल खड़ा हो गया मेरे सामने. दोबारा उन्हीं डाक्टर दोस्त के पास गयी. शाहिदा जी ने मेरी जिंदगी बदल दी. उन्होंने समझाया-तुम पढ़ी-लिखी हो, सुंदर हो, यंग हो तुम्हारे सामने तुम्हारी पूरी जिंदगी पड़ी है. गो एहेड लिव योर लादफ, गिव चांस टु योरसेल्फ डोंट शट द डोर फॉर लव, कोई आता है तो आने दो. 

उन दिनों मैं इप्टा मेंरक्तकल्याण कर रही थी. उसमें अंबा और इंद्राणी दोनों चरित्र मैं करती थी. लोगों ने मेरे अभिनय को बहुत पसंद किया. एक ही नाटक में दो अलग-अलग चरित्र जो एक दम कंट्रास्ट थे, करना मेरे लिए एक चुनौती थी. वहीं से राष्ट्रीय नाटक विद्यालय आने का रास्ता सूझा, हालांकि यह बहुत मुश्किल था. मेरे पति इसका जितना विरोध कर सकते थे, उन्होंने किया. उनकी मरज़ी के खिलाफ घर से भाग कर मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की परीक्षा के लिए गयी. अंतत: मेरा नामांकन नाट्य विद्यालय में हो गया. अब मेरे पति को मुझे खोने का डर और सताने लगा और वे भी मेरे पीछे-पीछे दिल्ली आ गये. वहां भी मैं खुल कर सांस नहीं ले पा रही थी. हर पल जैसे मैं किसी की पहरेदारी में हूं. मेरे क्लासमेट इसका बहुत मजाक उड़ाते थे. जाहिर है हमारे बीच उम्र का अंतराल भी सबके लिए उत्सुकता का विषय था. वे तरह-तरह की बातें करते. अब मेरे पति का व्यवहार और भी बदल गया था. लगातार मुझे खो देने की चिंता उन्हें लगी रहती, इस वजह से वे और भी अधिक असामान्य और अमानवीय व्यवहार करने लगे. यहां तक कि मैं किसी भी सहपाठी या शिक्षक से बात करती, उन्हें लगता, मैं उससे प्रेम करती हूं.

मैंने हमेशा उन्हें समझाने की कोशिश की कि वे बेकार की इन बातों को छोड़ कर लिखने-पढ़ने में अपना ध्यान लगायें. लिखने के लिए उन्हें सुंदर-सुंदर नोट बुक, हैंड मेड पेपर और कलम ला कर देती. बड़े-बड़े लेखकों-विद्वानों के वाक्य लिख-लिख कर देती ताकि वे खुद लिखने के लिए प्रेरित हों. गालिब की मजार और निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर ले जाती. खूबसूरत फूल उपहार में देती, पर मेरी किसी बात का उन पर कोई असर नहीं होता. मुझे समझ में नहीं आ रहा था आखिर इन्होंने लिखना बंद क्यों कर दिया है और मैं दिन पर दिन चिड़चिड़ी होती जा रही थी. मेरा भी अपनी पढ़ाई से मन उचट रहा था.

मैंने अपने पति में कई बार भगोडी़ और कायर प्रवृत्ति देखी. मुझे याद है शादी के तीन वर्ष बाद मैं ससुराल गयी थी, वहां सब लोग मुझसे यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि मुझे अब तक बच्चा क्यों नहीं हुआ. कुछ दिन पहले ही मेरी अबार्शनवाली घटना हुई थी. मैं रो पड़ी. मेरे पास कोई जवाब नहीं था. मैंने सिर्फ इतना कहा, मैं बांझ नहीं हूं, लेकिन मेरे पति ने इसका कोई जवाब नहीं दिया बल्कि उन्हें अपने पौरुष पर संकट उठता देख मुझ पर गुस्सा आया, जबकि सेक्स हमारे बीच कोई समस्या नहीं थी.

जिस आदमी ने मुझसे मां बनने का गर्व छीन लिया वह मुझ पर यह आरोप भी लगाता है कि मैंने एनएसडी में एडमिशन के लिए उससे शादी की और कैरियर बनाने के लिए बच्चा पैदा नहीं किया. मेरी शादी 1993 में हुई और चार साल शादी बचाने की सारी जद्दोजहद के बाद मैं एनएसडी में 1997 में आयी. क्या एनएसडी में एडमिशन के लिए आलोकधन्वा से शादी करना जरूरी था. शादी के चार साल बाद उन्होंने मेरा एडमिशन क्यों कराया. अगर शादी करना एडमिशन की शर्त थी तो शादी के साल ही एडमिशन हो जाना चाहिए था. मेरा गर्भपात 1995 में हुआ. उस समय न मैं एनएसडी में थी और न कैरियर के बारे में मैंने सोचा था. जबकि दुनिया की हर औरत की तरह एक पत्नी और मां बनने का सपना ही मेरी पहली प्राथमिकता थी. जहां तक आलोक का सवाल है, वह पिता इसलिए नहीं बनना चाहते थे क्योंकि वह कोई भी जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते थे. हद तो उन्होंने तब कर दी, जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के द्वितीय वर्ष में मुझे एक्टिंग और डायरेक्शन में से किसी एक को चुनना था. मैं एक्टिंग में स्पेशलाइजेशन करना चाहती थी. उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया. उनका दबाव था कि मैं डायरेक्शन लूं. हमारी इस बात पर बहुत बहस हुई. उन्होंने इतना दबाव बनाया कि मानसिक तनाव के कारण मैं डिप्रेशन में चली गयी. बाद में अनुराधा कपूर ने समझाया-तुम बेहतरीन अभिनेत्री हो. यू मस्ट टेक एक्टिंग. मैंने एक्टिंग ली. मेरे पति का विरोध बरकरार रहा. उन्होंने अनुराधा कपूर पर भी आरोप लगाया कि वह फेमिनिस्ट है. तुम्हें बहका रही है. वह तो मुझे अब समझ में आ रहा है कि वह आखिर किस बात पर इतने नाखुश थे. दरअसल मुझे अभिनय अलग-अलग लड़कों के साथ करना पड़ता. अलग-अलग नाटकों में अलग-अलग चरित्र और प्रेम के दृष्य करूंगी. उनकी कुंठा यहां थी. एक तरह की असुरक्षा की भावना उनमें घर कर गयी थी. काश कि वे समझ पाते कि मेरे मन में प्रेमी के रूप में उनके अलावा कोई दूसरा नहीं था. मैं उन्हें बहुत प्यार करती थी. दुनिया की तमाम खूबसूरत चीजों में मैं उन्हें देखती थी. मेरा सबसे बड़ा सपना था वे कविता लिखे और मैं अभिनय करूं. दुनिया देखे कि एक कवि और अभिनेत्री का साथ कैसा होता है. एक छत के नीचे कविता और अभिनय पनपे. मैं उनकी कविताओं को हद से ज्यादा प्यार करती थी. आज भी उनकी पंक्तियां मुझे जबानी याद हैं. मैं उनकी कविताओं की दीवानी थी. कई बार मैं उन्हें कोपरनिकस मार्ग पर बने पुश्किन की प्रतिमा के पास ले जाती. उनकी तुलना पुश्किन से करती ताकि उनका आत्मविश्वास बढ़े.

इस बीच उन्हें गले में कैंसर की शिकायत हुई. एक बच्चे की तरह उन्होंने अपना धीरज खो दिया और जीने की उम्मीदें भी. उन्हें डर था कि अब वे नहीं बचेंगे. पति ऐसे दौर से गुजर रहा हो तो एक पत्नी पर क्या बीतती है, इसका अंदाजा कोई भी पत्नी लगा सकती है. एक बच्चे की तरह उन्हें समझाती रही-कुछ नहीं होगा. फर्स्ट स्टेज है. डाक्टर छोटा-सा आपरेशन करके निकाल देंगे. उसी शहर में अकेले मैंने अपने पति के कैंसर का ऑपरेशन कराया, जहां वे मुझे बिल्कुल अकेली और बेसहारा छोड़ कर गये.

वे अक्सर जब लड़ते तो मुझे कहते- तुम मुझे समझती क्या हो? मैंने इसी दिल्ली में शमशेर और रघुवीर सहाय के साथ कविताएं पढ़ी हैं. मेरे नाम पर हॉल ठसाठस भरा रहता था और लोग खड़े होकर मेरी कविता सुनने के लिए बेचैन रहते. आज उसी शहर में लोग उसकी पत्नी की कीमत लगा रहे थे. दीवार क्या गिरी मेरे खस्ता मकान की, लोगों ने उसे आम रास्ता बना दिया. बिहार में एक कहावत है कि जर, जमीन और जोरू को संभाल कर न रखा जाये तो गैर उस पर कब्जा कर लेते हैं. अब हर आदमी की निगाह मुझ पर उठने लगी.

मेरे पति जिस वक्त मुझे छोड़ कर गये, उस वक्त मुझे उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी. मैंने एनएसडी से प्रशिक्षण तो प्राप्त कर लिया था पर रेपर्टरी में काम नहीं मिल पाया. अब आगे क्या करना है, पता नहीं था. एकदम शून्य नज़र आ रहा था. उनके जाने के साथ ही एक दूसरे किस्म का संघर्ष शुरू हो गया. सबसे अजब बात तो यह थी कि जैसे ही लोगों को पता चलता मैं अकेली रहती हूं, उनके चेहरे का रंग खिल जाता. मैं बिना किसी पर आरोप लगाये यह कहना चाहती हूं कि मुझे हासिल करने की कोशिश ऐसे शख्स ने भी की जिसकी खुद कोई औकात नहीं थी या फिर वैसे लोग थे जिनके अपने हंसते-खेलते परिवार थे. प्यारे-प्यारे और मेरी उम्र के बच्चे थे. वो अपनी और बच्चों के लिए दुनिया में सबसे अच्छे और ईमानदार पति और बेस्ट पापा थे और समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी. खैर अब मुझे इन बातों पर हंसी आती है. जिंदगी को इतने करीब से देखा कि अब किसी से कोई शिकायत नहीं. लोग मुझसे अजीव-अजीब सवाल पूछते, तुम अकेली कैसे रहती हो, तुम्हारा सैक्समेट कौन है. आज जो बातें मैं इतनी सहजता से लिख रही हूं उस समय ऐसा लगता जैसे कोई गरम सीसा मेरे कान में उंड़ेल रहा है.

जब लोगों को पता चला कि हमारे बीच दरार है तो उन्होंने भी मेरा भरपूर इस्तेमाल करने की कोशिश की. मेरे पति की किताब की रॉयल्टी मेरे नाम से है और मुझे आज तक एक पैसा नहीं मिला है. पिछले सालों में मैंने भी उनसे कुछ नहीं मांगा लेकिन अभी हाल ही में मेरी छोटी बहन की शादी के लिए मुझे रुपये की जरूरत थी तो मैंने अपना अधिकार मानते हुए रॉयल्टी की मांग की. उन्होंने (प्रकाशक ने) मुझे बदले में पत्र भेजा कि वह रॉयल्टी का पैसा कवि को दे चुके हैं. जवाब में मैंने पत्र लिखा कि जिसके नाम रॉयल्टी होती है पैसे भी उसे मिलने चाहिए तो उन्होंने मुझे बदनाम करने की कोशिश की. उन प्रकाशक के मित्र, जो मेरे अभिनय के प्रशंसक रहे हैं, फोन करके मुझे खचड़ी और बदमाश औरत जैसे विशेषणों से नवाजते हैं और कहते हैं कि वह जिंदा है तो तुम्हारा हक कैसे हो गया उसकी किताब पर? मैंने जवाब दिया कि मैं किसी की रखैल नहीं हूं, संघर्ष करती हूं तो गुजारा होता है. मैं अपने हक का पैसा मांग रही हूं. एक औरत जब अपने हक की आवाज उठाती है तो उसके विरुद्ध कितनी तरह की साजिश होती है. वह आदमी जो पूरी दुनिया में डंका पीटता है कि वह मुझे बेहद प्यार करता है, वह मेरे बिना जी नहीं सकता, वह मेरे वियोग में मनोरोगी हो गया, उससे मैं पूछती हूं, क्या उसने पति के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभायी? क्या उसने मुझे सामाजिक और भावानात्मक सुरक्षा दी? क्या उसने आर्थिक सुरक्षा दी? सभी जानते हैं मैं पिछले छह साल से अपनी अस्मिता और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हूं. पिछले छह साल से नितांत अकेली एक विधवा की तरह जी रही हूं. क्या वे मेरी तमाम रातें वापस लौटा सकते हैं? भयानक अपमान के दौर से गुजरे दिनों का खामियाजा कौन भरेगा? जिसके लिए मैंने अपने जीवन की तमाम बेशकीमती रातें रोकर बितायीं, वह मेरे लिए क्या एक बार मेरी उम्र के बराबर आ कर सोच सकता है? मैं अपनी उम्र की सामान्य लड़की की तरह क भी नहीं जी पायी. कभी पति के साथ कहीं घूमने नहीं गयी, पिक्चर या पार्टी में नहीं गयी. कितनी तकलीफ होती है जब एक स्त्री अपने तमाम सपने को मार कर जीती है.

छह साल से मैं अकेली एक ही घर में रह रही हूं, यह मेरे चरित्र का सबसे बड़ा सबूत है. मेरे मकान मालिक मुझे बेटी की तरह मानते हैं. मेरे घर न पुरुष है, न पुरुष की परछाईं. पर जब मैं एक बार अचानक पटना गयी तो अपने बेडरूम में मैंने दूसरी औरत के कपड़े देखे. इतना सब देखने के बाद क्या कर सकती थी मैं ? और क्या रास्ता था मेरे पास?

दिन-पर-दिन मैं असामान्य होती जा रही थी. न किसी से मिलने का मन होता न बात करने का. कोई हंसता तो लगता कि मेरे ऊपर हंस रहा है. कभी मैं देर रात तक दिल्ली की सुनसान सड़कों पर अकेली भटका करती. घर आने की मेरे पास कोई वजह नहीं थी. न किसी को मेरे आने का इंतजार, न कहीं जाने की परवाह. ऐसा लगता था, या तो आत्महत्या कर लूं या किसी कोठे पर जा कर बैठ जाऊं. लेकिन नहीं, अन्य दूसरे भले घर की बेटियों की तरह मेरे मां-बाप ने भी मुझे अच्छे संस्कार दिये थे, जिसने मुझे ऐसा कुछ करने से बचाया.

अपनी बीवियों पर खुलेआम चरित्रहीनता का आरोप लगानेवाले मर्द बड़ी आसानी से यह भूल जाते हैं कि वे खुद कितनी औरतों के साथ आवारगी कर चुके हैं. नहीं, किसी मर्द में स्वीकार करने की हिम्मत नहीं होती. देश का अत्यंत प्रतिष्ठित कवि, जिसके शब्दों में मैं एक रंडी हूं, उसकी आखिर क्या मजबूरी है मुझे हासिल करने की? क्यों नहीं वह मुझे अपनी जिंदगी से निकाल बाहर करता? मैंने तलाक के पेपर बनवाये. कमलेश जैन (प्रतिठित अधिवक्ता) गवाह हैं. मैंने अपने भरण-पोषण के लिए कुछ भी नहीं मांगा. तब भी वह मुझे तलाक नहीं दे रहा, बल्कि मुझे हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहा है. अपने मित्रों मंगलेश डबराल और उदयप्रकाश तक से पैरवी करवा रहा है, क्यों? इन सबके आग्रह और आलोक के माफी मांगने पर मैंने उन्हें एक मौका दिया भी था, लेकिन एक सेकेंड नहीं लगा, उन्हें अपने पुराने खोल से बाहर आने में. एकांत का पहला मौका मिलते ही पूछा-तुम्हारे कितने शारीरिक संबंध है?

मैं हैरान! अगर मेरे बारे में यह धारणा है तो मुझे पाने के लिए इतनी मशक्कत क्यों की?
आलोक जब मुझे हासिल करने में हर तरह से नाकामयाब हो गये तो उन्होंने मुझसे कहा-तुम रंडी हो, तुम्हारी कोई औकात नहीं, बिहारी कहीं की. दो कौड़ी की लड़की. शादी से पहले तुम्हें जानता कौन था. मेरी वजह से आज लोग तुम्हें जानते हैं, तुम जो कुछ भी हो, मेरी वजह से हो. मेरे आत्मसम्मान को ऐसी चोट पहुंची कि तंग आ कर मैंने अपने पिता का बचपन में दिया हुआ नाम क्रांति बदल लिया, जबकि मैं क्रांति भट्ट के नाम से अभिनय के जगत में अपनी पहचान बना चुकी थी.

मुझे अपने पिता का इतने प्यार से दिया हुआ नाम बदलने में बहुत तकलीफ हुई थी. अभी हाल में जब मैं अपने पिता से मिली तो उनसे माफी मांगते हुए कहा, माफ कीजिए. मुझे मजबूरीवश अपना नाम बदलना पड़ा. उन्होंने जवाब दिया- कोई बात नहीं. ठीक ही किया. क्रांति असीम है. क्रांति कभी हारती नहीं. क्रांति कभी रुकती नहीं. रिवोल्यूशन इज अनलिमिटेड.

मैं बिना किसी शिकायत और शिकन के आज कहना चाहती हूं- हां, दर्द हुआ था. अपने पति के मुह से रंडी का खिताब पा कर बहुत दर्द हुआ था तब जब उस इनसान ने मुझ पर इतना घिनौना आरोप लगाया. वह इनसान जिसका मैंने सारी दुनिया के सामने हाथ थामा. वह इनसान जिसके बच्चे को मैंने गर्भ में धारण किया. जो खुद मेरी गोद में मासूम बच्चे की तरह पड़ा रहता था. उसने आज पूरी दुनिया के सामने मेरी इज्जत को तार-तार कर दिया. मैं आज तक इस बात को नहीं समझ पायी कि जब दो इनसान इतने करीब होते हैं, वहां ऐसी बातें आ कैसे जाती हैं. ऐसी ठोस कुंठा और भयंकर इगो.

बहुत दर्द और लंबी यातना से गुजरी इस बीच. नितांत अकेली कोई नहीं था. बंद कमरे में खुद से बातें करती थी. ऊंचे वॉल्यूम में टीवी चला कर जब रोती थी तो किसी का कंधा नहीं था. बीमार पड़ी रहती थी, कोई देखनेवाला नहीं, दवा ला कर देनेवाला नहीं. पर आज सब कुछ सामान्य लग रहा है. जब कोई घाव पक जाता है तो दर्द देता ही है और उसका फूट कर बह जाना अच्छा ही है, चाहे दर्द जितना भी हो. घाव के पकने और बहने का यही सिलसिला है. मेरा घाव भी पक कर बह गया. दर्द हुआ. बेशुमार दर्द हुआ, लेकिन अब जख्म भर गया है. दर्द भी अपनी मुराद पूरी कर चुका.

मैं अपने अभिनय में अपनी काबिलियत की परीक्षा छह साल से दर्शकों को दे रही हूं और शुक्रगुजार हूं वे मुझे प्यार करते हैं. अब मेरी अपनी एक जमीन है, एक पहचान है.

जब मैं राम गोपाल बजाज के साथ गोर्की का नाटक तलघर कर रही थी तो बजाज जी ने मुझसे कहा था-बहुत सालों के बाद नाट्य विद्यालय में सुरेखा सीकरी और उत्तरा वावकर की रेंज की एक्ट्रेस आयी. सिर्फ़ अपने काम की वजह से एनएसडी में मुझे सारे क्लासमेट और सीनियर, जूनियर का प्यार मिला. मेरी काम के प्रति शिद्दत और लगन की वजह से हमेशा चैलेंजिंग रोल मिले. चाहे ब्रेख्त का नाटक गुड वुमन ऑफ शेत्जुआन हो या इब्सन के वाइल्ड डक में मिसेज सॉवी या चेखव के थ्री सिस्टर्स की छोटी बहन याविक्रर्मोवंशीय में उर्वशी की भूमिका.

एनएसडी के बाद सारवाइव करने के लिए मैं सोलो करती हूं. एक बार जेएन कौशल साहब ने कहा था- 10 लाइन बोलने में एक्टरों के पसीने छूटते हैं. सोलो के लिए तो बहुत माद्दा चाहिए. तुम एक बेमिसाल काम कर रही हो.
मेरे प्यार में पागल या मनोरोगी होने का ढिंढोरा पीटनेवाला दरअसल इस बात से ज्यादा दुखी है कि जिसे वह दो कौड़ी की लड़की कहता था, वह हार कर, टूट कर वापस उसके पास नहीं आयी. उन्हें इस बात का बहुत बेसब्री से इंतजार था कि एक-न-एक दिन मैं उनके पास लौट आऊंगी. इसलिए उन्होंने मुझे आज तक तलाक नहीं दिया. उनके पुरुष अहं को संतुष्टि मिलती है कि मैं आज भी उनकी पत्नी हूं.

शादी का मतलब होता है, एक दूसरे में विश्वास, एक दूसरे के दुख-सुख में साथ निभाना. लेकिन आलोक न मेरे दुख के साथ है, न सुख में. छह साल से ऊपर होने को आये. मुझे एक शिकायत अपने ससुरालवालों से भी है. कभी उन्होंने भी यह नहीं जानना चाहा कि आखिर समस्या कहां है. कभी किसी ने मुझसे नहीं पूछा कि आखिर बात क्या है. एक अच्छा परिवार तलाक के बाद भी रिश्ता रखता है, मेरा तो तलाक भी नहीं हुआ. अब भी मैं उस परिवार की बहू हूं. कानूनी और सामाजिक तौर पर मेरे सारे अधिकार होते हुए भी मैंने उन लोगों से कुछ भी नहीं लिया. तब भी वे लोग मुझे ही दोष देते हैं.

यह सब लिख कर मेरा कतई यह इरादा नहीं कि लोग मुझसे सहानुभूति दिखायें, मुझ पर दया करें. मैं बस यह चाहती हूं कि लोगों को दूसरा पक्ष भी मालूम हो.

आज तक मैं चुप रही तो लोगों ने मेरे बारे में खूब अफवाहें उड़ायीं. मैं सुकून से अपना काम करना चाहती हूं और लोग मेरी व्यक्तिगत जिंदगी की बखिया उधेड़ना शुरू कर देते हैं. जीवन की हर छोटी-छोटी खुशी के लिए मैं तरसती रही. लोग कहते हैं, मैंने उनका इस्तेमाल किया पर मैं कहती हूं, एक कम उम्र लड़की को भोगने की जो लालसा (या लिप्सा) होती है, क्या उन्होंने मेरा इस्तेमाल नहीं किया? जिस लड़की को शादी करके लाये, उसे पहले ही दिन से एक अवैध संबंध ढोने पर मजबूर किया गया. मैं जानती हूं, इस तरह के वक्तव्य किसी मर्द को अच्छे नहीं लगेंगे पर मैं यह कहना चाहती हूं कि दुनिया के हर मर्द को अपनी मां, बहन, बेटी को छोड़ कर दुनिया की सारी औरतें रंडी क्यों नजर आती हैं? मर्द उसे किसी भी तरह से हासिल करना चाहता है. आखिर यह पुरुषवादी समाज है. मर्दो में एक बेहद क्रूर किस्म का भाईचारा है. काश, यह सामंजस्य हम औरतों में भी होता. यहां तो सबसे पहले एक औरत ही दूसरी औरत का घर तोड़ती है और टूटने पर सबसे पहले घर की औरतें ही उस औरत को दोष देना शुरू कर देती हैं. मेरी कई सहेलियों ने कहा-अरे यार, समझौता करके रह लेना था, हम लोग भी तो रह रहे हैं. वे यह नहीं जानतीं कि समझौता करके रहने की मैंने किसी भी औरत से ज्यादा कोशिश की, आखिरकार मैं थक गयी. शायद और समय तक रहती तो खुदखुशी कर लेती. मुझसे कई शादीशुदा औरतें इस बात के लिए डरती हैं कि कहीं मैं उनके पति को फंसा न लूं, वे मुझे दूसरी शादी की नेक सलाह देती हैं. अपना भला-बुरा मैं भी समझती हूं पर क्या ताड़ से गिरे, खजूर में अंटकेवाली स्थिति मुझे मान्य होगी? शादी करके घर बसाने और बचाने की मैंने हर संभव कोशिश की और न बचा पाने की असफलता ने मुझे भीतर तक तोड़ दिया. एक पराजय का बोध आज भी है.

आज हर कदम फूंक-फूंक कर रखती हूं, जैसे कोई दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है.
फिर भी मैं दिल से शुक्रगुजार हूं अपने पति की, उन्होंने जो भी मेरे साथ किया. अगर उन्होंने यह सब न किया होता तो आज मैं असीमा भट्ट नहीं होती.

15 टिप्‍पणियां:

  1. क्या कहें हम... बहुत दुःख हुआ....

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  2. असीमा जी आप बहुत बहादुर हैं.... सच कहने की हिम्मत बेमिसाल है। अाप के शब्द जन्मों तक याद रखें जाने वाली नजीर है। जातियों और वर्ण की गंदी मानसिकता जेंडर में भी उतनी है। यहां हर स्त्री दलित और भोग्या है... जब तक प्राप्त न हो लक्ष्य है और मिलते ही मिट्टी। समाज में व्याप्त घृणित सामंती संस्कारों को तोड़ने की इस जंग और पुरुषवाद के पूर्वाग्रहों की जगह नई इबारत लिखने में अगर स्त्री वर्ग की कोई मदद कर पाऊं तो मैं शायद उस लक्ष्य का हिस्सा बन पाऊंगा... जो डा. भीमराव अंबेडकर ने दलितों और स्त्रीयों के लिए संविधान की रचना के वक्त तय किया था।
    देवेश कल्याणी
    समूह संपादक
    प्रदेश टुडे भोपाल मप्र

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  3. मैंने उस तथाकथित महान कवि की कोई कविता नहीं पढ़ी.... शायद अच्छा ही है....

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    1. कहने का हक तो नहीं बनता...लेकिन एक बात कहना चाहना हूं...जिस इंसान ने रिश्तों को ताक पर रख दिया; इंसानियत का धर्म भुला दिया. उस इंसान के इज्जत को आप!! अब तक कंधा देती आ रहीं हैं.

      आप इस जिंदगी में अपनी वो जिम्मेदारी भूलती जा रहीं हैं जिसमें "युवाओं को गलत के प्रति आवाज उठानी चाहिए" का संदेश होता है. जबकि आप अभी स्वंय सामाजिक कार्य कर रहीं मालूम होतीं हैं.

      आप जब आज अपना भार स्वंय उठा रहीं हैं तो उस इंसान को पूरे समाज के सामने तलाक देकर उसे बेनकाब करें और उसकी पुरूषवादी सोच को....................करें!!!

      इस मृत्युलोक से कौन क्या ले जाता है...जो करता है; वही उसके पीछे छूट जाता है...जो समाज में युवाओं का प्रेरणास्त्रोत बनता है...

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  6. बहुत दुख: हुआ हमें आपकी आपबीती पढ़कर असीमा जी ।

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  7. शायद इसिलिए नारी की प्रकृति रचना है
    आपको ह्रदय से प्रणाम

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  8. शायद इसिलिए नारी की प्रकृति रचना है
    आपको ह्रदय से प्रणाम

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  10. Naman hai aapke sahas ko. Jab insan ki pahchan ho jaye to raste alag kar lene chahiye. Masoom ko dubara mauka diya ja Sakta hai par samjhadaro ko kabhi nahi. God bless you.

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